१. परमात्मा एकमेव एक ही हैं

वैविध्यपूर्ण इस वैज्ञानिक युग में प्रत्येक मनुष्य निज जीवन में अधिकाधिक सुख प्राप्ति हेतु प्रयत्नशील रहता है; दिन-रात महेनत करता है, परंतु प्राप्त करने योग्य सर्वश्रेष्ठ एवं शाश्वत सुख तो केवल परमात्मा के स्वरूप में ही विद्यमान है, जिसकी प्राप्ति उपरांत कुछ शेष नहीं रहता। वे परमात्मा सर्वव्यापक एवं अपार हैं, वे एक ही हो सकते हैं। अगर वे दो होते तो एक-दूसरे को सीमित करते, उभय मर्यादित हो जाते। वे सर्वोपरि परमात्मा ही सर्व को सुख, ऐश्वर्य एवं सामर्थ्य के प्रदाता हैं। सर्व कारण के कारण, सर्वावतारी, सर्वकर्ता, सदैव दिव्य साकारमूर्ति एकमेव एक ही परमात्मा हैं। जिनकी हम सर्वोपरी भगवान श्री स्वामिनारायण स्वरूप से उपासना करते हैं।