• परिशिष्ट : मानसी पूजाविधि
श्री स्वामिनारायण भगवान में अतिशय स्नेह वृद्धि के हेतु मानसी पूजा उत्तम साधन होने के कारण नियमित रूप से भावपूर्वक मानसी पूजा करें।
श्रीजीमहाराज की मानसी पूजा दिन में पाँच बार करें। पवित्र होकर, पवित्र आसन पर बैठकर श्रीहरिजी की महिमा सोचें। निजात्मा को तीन देह से भिन्न मानकर प्रतिलोमरूप से पुरुषोत्तमरूप की भावनाकर वा तेजरूप अक्षरधाम के संग एकता की भावनाकर स्वयं में बिराजमान श्रीहरिजी का ध्यान कर, मानसी पूजा करें।
1. सुबह पाँच से सात बजे के समय में प्रथम मानसी पूजा करें। योगनिद्रा से सुखशय्या में शयन करते हुए श्रीहरिजी की संत-हरिभक्त स्तुति-प्रार्थना करते हैं तब श्रीहरिजी जागृत होकर तकिये से टिकाकर बिराजमान होते हैं। उनके अंग-प्रत्यंग अतिशय शोभायमान हैं। श्रीहरिजी नित्यविधि करने पधारते हैं। शौच कर आये श्रीहरिजी को जल एवं मृतिका से हस्तचरण की शुद्धि करवाकर दतुवन दें। सुगंधित जल से मुख प्रक्षालित करवायें सुंदर पाट पर बिराजितकर उनके अंग प्रत्यंग में इत्र-सुवासित द्रव्यों का मर्दनकर, जल से भावपूर्वक स्नान करवायें। तत्पश्चात् उत्तम वस्त्राभुषण ऋतुनुसार पहनाएँ। इत्र-केसर चंदन की अर्चना ललाट पर करें। सुगंधित पुष्प के हार, तुर्रे, गजरा, बाजुबंध धारण करवायें। धूप-दीप अर्पण करें। सक्कर-ईलायची-केसर-बादाम आदि डाला हुआ गर्म दूध पान के हेतु दें। दिव्य पकवान अल्पाहार के हेतु दें। उन्हें श्रीहरिजी ग्रहण करते हैं एवं मैं पंखा झेलता हूँ तथा सेवा करता हूँ ऐसे भाव से श्रीहरिजी की धारणा करें। भोजन के पश्चात् जलपान-मुखवासन करवाकर पलंग पर बिराजमान करवायें उस समय मुक्त प्रसादी ग्रहणकर श्रीहरिजी की चारोंओर बैठकर दर्शन करते हैं, श्रीहरिजी वार्ता-सुख प्रदान करते हैं। उस मूर्ति के दिव्य सुख का मैं अनुभव करता हूँ ऐसी भावना करें।
2. सुबह साडे दस से साडे ग्यारह बजे तक दूसरी मानसी पूजा करें। श्रीजीमहाराज दिव्य वस्त्राभुषणों को धारण कर दिव्य सिंहासन पर बिराजित हैं। भोजन का समय होने से श्रीहरिजी स्नानकर पितांबर धारणकर, श्वेत वस्त्र ओढकर, सुशोभित पाट पर बिराजित हैं। स्वर्ण की थाली-कटोरी में श्रीहरिजी को विविध पकवान-नमकीन-सब्जी-दाल आदि दिव्य भोजन परोसकर प्रेमपूर्वक गद्गद् कंठ से आग्रहपूर्वक भोजन करवायें। सर्व मुक्त श्रीहरिजी के दर्शन करते हैं। श्रीजी भोजनकर तृप्त होकर सुगंधित जलपानकर मुखवासन लेकर पर्यंक पर बिराजते हैं। श्रीहरिजी के दर्शन, स्पर्शरूप प्रसाद लेकर श्रीहरिजी का ध्यान करें।
3. दोपहर को चार बजे के समय तीसरी मानसी पूजा करें। योगनिद्रा से दिव्य पर्यंक पर शयन करते श्रीजीमहाराज की चारों ओर मुक्त बैठकर दर्शन करते हैं। श्रीहरिजी जागृत होते ही मुक्तगण ‘जय! जय!’ बोलकर दर्शन करते हैं। श्रीजी की मूर्ति में से तेज एवं सुख के फव्वारे निकलते हैं। पश्चात् श्रीहरिजी को मैंने जल प्याला प्रदान किया उससे कुल्लाकर मुखशुद्धिकर श्रीहरिजी जलपान करते हैं। तत्पश्चात् ताजे-सुके मेवे तथा ऋतु अनुसार फल को अंगीकार करते हैं तथा सभी को प्रसाद प्रदान करते हैं। ऋतु अनुसार श्रीहरिजी घोडे पर सवार होकर नदी में स्नान हेतु या फूलबाडी में घूमने पधारते हैं। मुक्तगण संग हैं। श्रीहरिजी की अद्भुत लीला से सभी अहो! अहो! भाव पाते हैं। तदुपरांत श्रीजी की चंदनपुष्प से पूजा करता हूँ तथा श्रीहरिजी के दिव्य सुख का अनुभव करते हुए उस स्वरूप में जम जाता हूँ, ऐसे भाव से धारणा करें।
4. संध्या आरती के पश्चात् चौथी मानसी पूजा करें। महाराजाधिराज श्रीजीमहाराज दिव्य शोभायुक्त दिव्यासन पर बिराजमान हैं। अनंत मुक्त हाजिर हैं। मैं श्रीहरिजी की आरती करता हूँ; मुक्तगण दर्शन करते हैं। श्रीजी की मूर्ति में से अतिशय सुख के बिंब निकलते हैं। आरती के पश्चात् श्रीहरिजी सभी को छाती में चरणारविंद प्रदान करते हैं, मुझे भी प्रदानकर कृतकृत्य करते हैं तथा अति प्रसन्न होकर भेंटते हैं। पश्चात् श्रीहरिजी ब्यालू करने पाट पर बिराजते हैं। खीचडी-कढी-रोटी-सब्जी-दूध-घी वगैरह नैवेद्य रखेहुए दिव्य भोजन श्रीजी ग्रहण करते हैं। पश्चात् हस्त प्रक्षालन कर जलपान कर मुखवासन ग्रहण कर पर्यंक पर बिराजते हैं। सभी मुक्तगण श्रीजी के सुख में गुलतान हैं एवं मैं भी उसमें सुख प्राप्ति करता हूँ ऐसा अनुभव करें।
5. शयन आरती के पश्चात् आखरी मानसी पूजा करें। श्रीजीमहाराज सुंदर उबाला हुआ दूध, बादाम की पूरी, बेसन के लड्डु आदि ग्रहण कर जलपान करते हैं। तत्पश्चात् श्रीहरिजी बिछौना, तकिये तथा गाल के समीप रखने के तकिये सहित सुखशय्या में शयनकर योगनिद्रा अंगीकार करते हैं। श्रीहरिजी मेरे हृदयाकाश में प्रेमरूप पर्यंक में शयनकर अक्षरधामरूप मेरी आत्मा में ही अखंड बिराजमान होते हैं, मैं उस मूर्ति में एकरूप होकर संलग्न हुआ हूँ वा समीप सेवा में रहकर पगचंपी करता हूँ ऐसी धारणा करें।
पाँचो बार की मानसी पूजा श्रीहरिजी की महिमापूर्वक प्रेम से एवं प्रत्यक्ष भाव से करें। यंत्रवत् या शुष्क मन द्वारा न करें। इस प्रकार प्रेमपूर्वक मानसी पूजा करनेवाले पर श्रीहरिजी अति प्रसन्न होते हैं।