४. अनादिमुक्त की सार्ध शताब्दी का उत्सव क्यों?
अनादिमुक्त का प्राकट्य अनंत जीवों को श्रीहरि के दिव्यसुख की प्राप्ति के हेतु भगवान श्री स्वामिनारायण के मात्र संकल्प से होता है। सर्वोत्तम उद्धार के उस आदर्शानुसार, अनादि महामुक्त श्री अबजीबापाश्री कच्छ भूमि पर भूज से 18 कि.मी. दूर स्थित तथा महाप्रभु के पावन चरण से आठ बार अंकित हुए श्री बलदिया (श्री वृषपुर) ग्राम में संवत 1901 के कार्तिक शुकल प्रबोधिनी एकादशी के दिन प्रकट हुए। उन्होंने आत्यंतिक मोक्षरूप अनादिमुक्त की सर्वोच्च स्थिति की लक्ष्यार्थ समझ करवायी, अनेक संत-हरिभक्तों को श्रीहरि के परमपद के अधिकारी बनाकर, मूर्ति के सुखभोक्ता कर दिये थे। उन्होंने सर्वोपरि आदर्श तत्त्वज्ञान से भरपूर ग्रंथ ‘श्री वचनामृतम्’ पर प्रश्नोत्तर रूप से सरल भाषा में समझ प्रदान करती हुई श्रेष्ठ मार्गदर्शिका सदश ‘रहस्यार्थ प्रदीपिका टीका’ की रचना रचकर सदा के लिये मोक्ष का मार्ग सरल एवं सुलभ बना दिया है। उनकी दिव्यवाणी ‘श्री अबजीबापाश्री की वार्ता भाग 1-2’ के नाम से प्रकाशित हुई है। उन दोनों भाग में श्रीजीमहाराज की मूर्ति में ओतप्रोत रहने की वार्ता रूप अमृतरस छलकता है। मात्र मूर्ति, मूर्ति एवं मूर्ति ही! इसके अतिरिक्त किसी बात का स्मरण या अध्यापन बापाश्रीने नहीं रखा। ये दोनों भाग शीतल ज्ञानजल से परिपूर्ण हैं, जिसके पठन से जीव में शीतलता हो जाती है।
स. गु. श्री गोपालानंदस्वामी के शिष्य स. गु. श्री निर्गुणदासजीस्वामी स्वयं के सर्व संत-हरिभक्त को बार-बार कहते थे कि, ‘श्री स्वामिनारायण भगवान ने स्वयं का अलौकिक सुख प्रदान करने के हेतु वर्तमान में इस ‘अबजीभाई’ को भेजा है।’ बापाश्री की बेनमुन सादगी, उनके जीवन तथा वर्तन की एकता उनकी आज्ञापालन तथा शिस्त वास्तव में अद्भुत थे। बापाश्री के जीवन में पग-पग पर सभी को वेद की ऋचाओं का साक्षात्कार होता; उनकी हरेक क्रिया में अलौकिता का अनुभव हुए बिना नहीं रहता। परम कृपालु श्री अबजीबापाश्री बडे-बडे पारायण-यज्ञ करते उस समय आशीर्वाद देते कि, ‘इस यज्ञ में जो उपस्थित रहेगा, जो प्रसाद ग्रहण करेगा, उन सभी का आखरी जन्मकर हम अक्षरधाम में ले जाएंगे’ कैसा अद्भुत सामर्थ्य! कैसी अद्भुत प्राप्ति! अनादिमुक्त की बात ही न्यारी!
अनादिमुक्त की सार्ध शताब्दी अक्षरधाम की अलौकिक प्राप्ति, आखरी जन्म के दुर्लभ आशीर्वाद तथा अमोघ कृपा प्राप्त कर लेने का अनुपम पर्व है। ऐसे पुनित प्रसंग पर श्रीहरि प्रसन्न होकर अपार कृपा वर्षा करते हैं जिससे हमारे अवयव परिवर्तित हो जाते हैं। पंचनियम का यथार्थ पालन कर दृढ विश्वास एवं महिमा सहित उस कृपा को त्वरित ग्रहण करना यही अनादिमुक्त की सार्ध शताब्दी के उत्सव की फलश्रुति है।