२. प्रभु दर्शन का राजमार्ग
संवत 1837 की साल थी। उस समय व्याप्त अज्ञानरूप तिमिर का लय कर, अनंत जीवों को निज दिव्य सुख की प्राप्ति करवाने के हेतु उत्तर प्रदेश के छोटे से ग्राम श्री छपैयापुर में श्री स्वामिनारायण महाप्रभु प्रकट हुए। उस समय में जब कि, संदेश-व्यवहार एवं परिवहन सीमित थे उस समय भगवान श्री स्वामिनारायण ने 25 से 27 वर्ष के अल्प समय में लाखों मनुष्य को निज स्वरूप का ज्ञान प्रदानकर स्वयं के अनन्य आश्रित बनाये। सभी को निज के सर्वोपरि पुरुषोत्तम स्वरूप के सुख का अनुभव हो उसके हेतु आवश्यक पात्रता प्राप्ति हेतु उन्होंने आंतर-बाह्य शुद्धि का सरल, परंतु पूर्ण मार्ग दर्शित किया; यह हैं उनके सर्वजीवहितावह पंचनियम (पंचमहाव्रत) का यथार्थ पालन।
सर्वोपरि महाप्रभु के दिव्य स्वरूप में जिनकी अलौकिक स्थिति हुई हो, ऐसे अनुभवी सिद्धमुक्त को पहचानकर उनके योग द्वारा उन पंचनियम के स्थूल तथा सूक्ष्म अर्थ को समझकर, उनके कथनानुसार अमल करें तो जिसे करना-पाना है उसकी प्राप्ति को देर नहीं लगती। यही प्रभुदर्शन का राजमार्ग है। यह लघु पुस्तिका इस दिशा में मार्गदर्शनरूप होगी।