११. सुख-दुःख
अनंत जन्मों से जीव सुखप्राप्ति के हेतु भटकता है और मनुष्य जन्म में भी बचपन से सुख के लिये बेकार प्रयत्न करता है, परंतु वास्तविक सुख, शाश्वत सुख किस में है और वह किस प्रकार से प्राप्त होता है यह अधिकांश वर्ग को ज्ञात नहीं होता है। अतः दुखों का अंत नहीं होता है।
सभी सुख एवं सुखप्राप्ति के साधन-सुविधा के इच्छुक हैं, परंतु प्रेय तथा श्रेय के भेद को नहीं समझने के कारण कई भौतिकवादी बन जाते हैं। उस भेद को यथार्थ समझकर श्रेय का मार्ग ग्रहण करनेवाला अध्यात्मवादी बनता है।
संसार संबंधित लौकिक सुखों को भी वही व्यक्ति भलीभाँति भोग सकता है जो संयमपू्र्वक तथा शास्त्रों की मर्यादा में रहकर भोगता है। उदाहरण स्वरूप जो स्वाद के कारण अधिक खाता है, वह रोगी बनता है और जो संयमपूर्वक मिताहार करता है, वह निरोगी एवं पुष्ट होता है।
जो साधक परब्रह्म की प्राप्ति का इच्छुक है, मुक्त होना चाहता है, वह पंचविषय के सुख को आसक्तिपूर्वक भोगते रहता है, तो कभी भी मुक्त नहीं हो सकता है।
पंचविषय के भोगों में भी सुख है ऐसी मान्यता रखने वाला व्यक्ति कभी भी उन भोगों की लालसा में से छूट नहीं सकता है।
एक इन्द्रिय के सुख को लेने की रुचि रखने वाला, अन्य इन्द्रियों के सुख लेने से बच नहीं सकता है। एक इन्द्रिय निर्बाध छोडे तो सभी इन्द्रियाँ निर्बाध हो जाती है और अपने-अपने विषयों के प्रति आकर्षित हो जाती है।
एक इन्द्रिय को सुख लेने में आसक्त करने से अन्य इन्द्रियों में भी उत्तेजना उत्पन्न हो जाती है। जिस प्रकार नेत्र से रूप देखने से स्पर्शेन्द्रिय भी उत्तेजित होगी। नेत्र से मिष्ट भोजन दृष्टिकृत किया तो, रसना इन्द्रिय में स्वाद उत्तेजित होगा। उसकी सुगंध से घ्राणेन्द्रिय उत्तेजित होगी, उसे लेने के लिये हाथ भी कार्यरत होंगे। मधुर आवाज सुनने से उसका रुप देखने की ईच्छा जागृत होगी। अतः एक इन्द्रिय पर संपूर्ण नियंत्रण रखने से धीरे - धीरे अन्य इन्द्रियाँ भी नियंत्रण में आ जाती है। उदाहरण स्वरूप रसना इन्द्रिय जीतने से क्रमशः अन्य इन्द्रियाँ जीती जा सकती है।
पंचविषय संबंधित भोगों में प्रथम सुख का भास होता है। उसके उपभोग के पश्चात, अंततः इसमें दुख ही है, यह प्रतीत होता है। जब कि परमात्मा संबंधित सुखप्राप्ति के मार्ग में प्रथम दुःख एवं कष्ट प्रतीत होते हैं, परंतु अंततः शाश्वत सुख की प्राप्ति होती है। पंचविषय का सुख मृगतृष्णा तुल्य आभासी एवं नाशवंत है। जब कि परमात्मा संबंधित सुख अनुभवजन्य, अलौकिक तथा अविचल है।
"इन्द्रियों के भोगों की वृत्ति को नियंत्रण में लाया जा सकता है।" यह बात संभव है। इसकी स्वीकृति तो कई व्यक्ति करते हैं, परंतु 'इस इन्द्रिय की वृत्ति को मैं तुरंत जीत लुंगा' ऐसी सकारात्मक दृढ़ भावना तथा उसके अनुरूप प्रयत्न कोई नायाब व्यक्ति ही करता है।
सत्पुरुष एवं सत्शास्त्र के कथनानुसार विषयभोग में मृगतृष्णा तुल्य सुख का आभास मात्र ही है। यह सुख नहीं, दुःख ही है, तथापि उसमें लौकिक मनुष्य को सुख प्रतीत होता है। सत्पुरुष के कथन में तथा लौकिक मनुष्य के कथन में विरोधाभास है, तो क्या करें? साधक को सत्पुरुष तथा सत्शास्त्र के वचन में निःशंकरुप से विश्वास तथा श्रद्धा रखकर उनकी बात को ही स्वीकार कर जीवन में उतारना पड़ेगा, अन्यथा वह साधना में सफल नहीं हो सकता है।
दुःखों से व्याकुल हुआ व्यक्ति एकाग्रता के अभाव में प्रभुप्राप्ति की ओर अग्रसर नहीं हो सकता है। अतः सुख - दुःख में स्थितप्रज्ञ होना अनिवार्य है।
पुरुषार्थ और परिश्रम से कष्ट होता है यह विचार क्षतिपूर्ण है। क्योंकि परिश्रम और पुरुषार्थ सुखप्राप्ति के प्रथम सोपान है। प्रभु की कृपा प्रसन्नता भी पुरुषार्थी पर ही होती है।
मन एवं इन्द्रिय को जीतने के लिये की गई तपस्या को प्रभुप्राप्ति के साधन के रुप में स्वीकारी जाए तो वह कष्टदायी न लगते हुए आनंदप्रद लगती है। परंतु उसे प्रभु प्रसन्नता का साधन न माने तो कष्टप्रद हो जाती है।
भूतकाल के दुःखों का मनन करने से शांति का अनुभव कदापि नहीं होता है, वरन नए दुःखों के जन्म होने का कारण बनता है। अतः भूतकाल भूलकर प्रभु की स्मृति सह आनंदपूर्वक वर्तमान में जीना, सुख-शांति प्राप्त करने का अचूक उपाय है।
"सूरपूर, नरपूर, नागपुर ये तीन में सुख नाहीं कां सुख हरि के चरण में, कां संतन के मांही" उक्त पंक्ति के अनुसार सच्चा सुख प्रभु में तथा सत्पुरुष में ही है। परंतु प्रत्यक्ष योग नहुआ हो तब क्या करें? ऐसा योग न हुआ हो तब आंतरिक वृत्ति से प्रभु के स्वरूप का तथा मुक्तपुरुष का उनकी दिव्य स्मृति द्वारा अखंड योग करते रहना ही सुखप्राप्ति का अमूल्य उपाय है।