१. जीवन का ध्येय
मनुष्य जीवन का परम एवं चरम ध्येय परमात्मा का साक्षात्कार कर, उन के साथ परमऐक्य को साधकर तादृश्य होना है। यह अनेक शास्त्रो में कथित है:
क्योंकि जीवमात्र पूर्ण, स्थायी एवं शाश्वत सुख - शांति - आनंद का इच्छुक है तथा सर्व दुःखों से यथार्थ रुप से मुक्ति का इच्छुक है। यह स्थिति केवल परमात्मा के दिव्य स्वरुप की प्राप्ति द्वारा ही संभव है। इस के अतिरिक्त अन्य किसी लक्ष्य की सिद्धि के द्वारा संभव नहीं है।
मनुष्य जीवन सत्य-असत्य का विवेक कर, असत्य को त्याग कर सत्य का ग्रहण करने के हेतु है, परंतु इसका मूल उद्देश्य सर्व प्रकार के दुःख एवं पीड़ा से मुक्ति प्राप्तकर शुद्ध, स्थायी एवं शाश्वत सुख की प्राप्ति ही है।
दीर्घकाल पर्यंत हमारे चिंतन का विषय यह होना आवश्यक है कि मनुष्य जीवन की सार्थकता किसमें है: इसका पूर्णतः निर्णय-निश्चय कर मन में संशय रहित स्थिति निष्पन्न करें तथा इस स्थितप्रज्ञ स्थिति को प्रतिपल दृढ़ करते रहे। तत्पश्चात ही हम आत्यांतिक मुक्ति रुप लक्ष्य की प्राप्ति की ओर प्रगति कर सकते हैं।
जीवन के दो मार्ग हैं प्रेय मार्ग तथा श्रेय मार्ग। प्रेय मार्ग संसार के भौतिक भोगों की प्राप्ति का मार्ग है। जब की श्रेयमार्ग परमात्मा के अविचल दिव्य सुख की प्राप्ति का मार्ग है। प्रेयमार्ग में अनंत प्रकार के दुःख तथा मनुष्यजीवन की असार्थकता विद्यमान है, जब की श्रेयमार्ग में शाश्वत सुख-शांति, परमानंद की उपलब्धि तथा जीवन की सार्थकता समाविष्ट है। साधक को श्रेयमार्ग द्वारा आत्यंतिक मोक्ष प्राप्ति का लक्ष्य बनाकर, उस में एकाग्र एवं स्थिर होने का प्रयत्न करना चाहिए।
ईश्वर प्राप्ति का लक्ष्य यहाँ - वहाँ से एकत्रित किया हुआ अपरिपक्व ज्ञान तथा उससे संबंधित अल्प चिंतन-मनन करने से सिद्ध नहीं होता है।
उसके हेतु कई वर्ष पर्यंत संपूर्ण जागृति (Total awareness) सह आत्मनिरीक्षण द्वारा स्वयं की कसौटी कर, अस्खलित पुरुषार्थ करना आवश्यक है।
कई लोग मात्र भावुकतावश मुक्त दशा की प्राप्ति को ध्येय बना लेते हैं। परंतु उस लक्ष्य को अनुभूति की कसौटी पर प्रमाणित किये बिना क्या बाधक है तथा क्या साधक है इसका निर्णय किये बिना ही स्वयं की मर्यादा एवं सामर्थ्य को जाने बिना ही निर्णय करते हैं। ऐसा निर्णय दीर्घकाल पर्यंत नहीं टिक सकता। "त्याग न टके रे वैराग्य विना" (त्याग वैराग्य के बिना टिक नहीं सकता है) सद्गुरु निष्कुलानंद स्वामी की उक्तिनुसार किसी भी क्षण सांसारिक प्रलोभन में आकृष्ट हो जाता है।
प्रभु प्राप्ति का ध्येय निश्चत कर, उससे संबंधित पर्याप्त विचार कर कुछ निर्णय भी किये, तथापि व्यक्ति को स्वनिरीक्षण करने से स्वयं में कई छिद्र दृष्टिगोचर होंगे। सूक्ष्म तौर पर निरीक्षण करते रहने से अधिकाधिक छिद्र-दोष ज्ञात होंगे। उनदोषों के प्रति जागरुक होने से, उन पर विजय प्राप्ति की तीव्र ईच्छा होगी। इसी प्रकार आंतरिक संघर्ष करते रहने से प्रभुप्राप्ति का ध्येय ही प्रिय लगेगा, उस में ही शाश्वत सुख-शांति विध्यमान है ऐसा प्रतीत होगा। उस ध्येय के अतिरिक्त सभी कुछ कष्टदायी, दुःखदायी तथा तुच्छ प्रतीत होगा, तब ही विवेक की दृढता मानी जायेगी।
जो व्यक्ति सत्पुरुषों का लक्ष्य तथा आज के भौतिकवादी लौकिक व्यक्ति के परभाव की दृष्टि से तुच्छ लक्ष्य के भेद को नहीं जानता, वह दीर्घकाल पर्यंत संसृति (जन्म-मृत्यु के फेरे) में भटकता है।
प्रभु प्राप्ति को मुख्य ध्येय बनाने से, पंचवर्तमान के यथार्थ पालन में एवं यम-नियममें अतिदृढ श्रद्धा तथा प्रभु के स्वरूप में परा, प्रेम, अनन्य भक्ति का उदय होता है।
प्रभु को ही मुख्य ध्येय बनाकर, उसकी प्राप्ति के मार्ग पर, वो ही चल सकता है जो नित्य त्रिकालबाधित (तीनोंकाल में न बदलें) सत्य का ही अनुसरण करने को तत्पर रहता है।
प्रभु प्राप्ति को मुख्य ध्येय बनाने वाले साधक की प्रभु हर प्रकार से सहाय करते हैं, रक्षा करते हैं तथा उसके योगक्षेम का वहन भी करते हैं।
प्रभु प्राप्ति ही जीवन का ध्येय है, यह निश्चत होने के पश्चात साधक के समक्ष अनेक मत-मतांतर, धर्म-संप्रदाय, गुरु, उपदेशक, शास्त्र, आदि होते हैं। धर्मगुरु में भी अधिकतर बिना अध्यात्म की अनुभूति, मतिमंद, स्वार्थपरायण, दंभी तथा स्थापित हित वाले होते हैं। साधक के लिये कौन सा मत, कौन सा धर्म, कौन सी उपासना ग्रहण करे, किसे गुरु करें आदि चुनौतियाँ होती है। ऐसे समय पर निज अंतःकरण में सर्वोपरि, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, परमात्मा को श्रद्धापूर्वक, हृदय से प्रार्थना करते रहने से उपर्युक्त विषय में यथार्थ मार्गदर्शन मिलता है। प्रभु उसे सच्चे गुरु उपलब्ध करवाते हैं। गुरु की शोध में भी अंधश्रद्धा न रखकर खुद की विवेक शक्ति का उपयोग कर, जाँच करते रहे कि गुरु में प्रभु के कल्याणकारी गुण हैं? उन को साक्षात्कार की अनुभूति है? या मात्र दंभ ही है? ऐसी जाँच से सच्चे गुरु की परख होती है। सच्चे गुरु की उपलब्धि के पश्चात ही परमात्मा का ज्ञान, उपासना, धर्म, आदि स्पष्ट होते हैं। तत्पश्चात ही साधना पथ निर्बाध होता है।