४. ज्ञान - अज्ञान

शुभ-अशुभ, अच्छे-बूरे कार्य, हमारे ज्ञान-अज्ञान के फलस्वरुप है। कर्मो के प्रवृत्त होने में ज्ञान-अज्ञान कारणरूप है। ज्ञान में त्रूटि या दोष आए तो कर्म में भी त्रूटि आती है, मात्र यही नहीं, अपितु ज्ञान में त्रुटि-क्षति आए तो नये ज्ञान की प्राप्ति में भी त्रुटि आ जाती है।

सच्चा वैराग्य तथा प्रभु के स्वरूप की शुद्ध उपासना प्राप्त न होने का मुख्य कारण ज्ञान में त्रुटि होना है। फलस्वरूप बुद्धि का विकास नहीं हो सकता है, अतः आत्मा की प्रगति अवरोधित होती है।

सही दिशा में विचारने में दोष होने के कारण व्यक्ति जीवन को सुखी बनाना चाहे, तथापि जीवन को सुखी बना नहीं सकता।

स्वयं के अनुमान से अथवा प्रत्यक्ष प्राप्त हुए ज्ञान की तुलना, सत्पुरुष द्वारा प्रदान किये गए ज्ञान की तुलना से कर, क्षति को सुधारते रहने से ज्ञान का विकास होता है एवं उसमें दृढ़ता आती है।

जब स्वयं का अनुभव एवं ज्ञान अपूर्ण होने के कारण उपयोगी न हो तथा स्थिति डांवाडोल हो रही हो, उस समय साधक को सत्पुरुष के अमूल्य शब्दप्रमाण ही सहायक एवं उपकारक होते हैं। उसके द्वारा ही स्वयं को विपरित परिस्थिति में भी बचाकर रख सकता है।

आत्मा-परमात्मा संबंधित सत्यज्ञान का निश्चय होने की अनुभूति हो, तथापि जागरुक रहकर अविरत रुप से उसकी रक्षा करते रहनी चाहिए। अन्यथा प्रतिकूल समय में उसमें संशय, शक या मिथ्याज्ञान उद्भवित हो सकता है।

अज्ञान-अविद्या तथा उसका उद्भवित स्थान चित्त में, संग्रहित संस्कारो को पूर्णरुप से निर्मूल करने से ही व्यक्ति परमात्मा के पूर्ण सुख तथा शाश्वत शांति का अनुभव कर सकता है। ऐसी स्थिति, प्रभु के स्वरुप में निर्विकल्प समाधि होकर साक्षात्कार होने से ही संभव है।

साधक स्वयं की आत्मा को परमात्मा के स्वरुप के साथ एकत्व के, साधर्म्य के दिव्यभाव का अखण्ड सातत्य के जतन का प्रयत्न न करे और प्रमाद रखे तो यह स्पष्ट है कि उसमें अज्ञान अभी शेष है। ऐसी अज्ञानता का, आत्यांतिक मोक्ष की प्राप्ति में विलंबरुपी दंड भुगतना पडता है। अतः साधक को इस संदर्भ में सावधानी रखने की अत्यंत आवश्यक्ता है।

वाच्यार्थ ज्ञान अनुभव ज्ञानरुपी लक्ष्यार्थ में परिवर्तित न हो, तब तक वह अज्ञान ही है। क्योंकि ऐसा ज्ञान साक्षात्कार अनुभव के अभाव में केवल अल्प जानकारी ही है।

'ऋते ज्ञानान मुक्तिः' ज्ञान के बिना मुक्ती नहीं। इस उक्ति में ज्ञान का अर्थ अनुभवज्ञान ही है, वाच्यार्थज्ञान नहीं है।