१२. सत्य-असत्य

मन से मानी हुई मनस्वी बात को ही ग्रहण करना मानवधर्म नहीं है। सत्पुरुष तथा सत्शास्त्र के प्रमाण रुप वचन मानकर जीवन में उतारना ही वास्तविक अर्थ में मानवधर्म है। यही सत्य तथा असत्य के विवेक का अर्थ है।

मन की चंचलता रुककर, स्थिरता आने पर ही सत्य-असत्य, कर्तव्य-अकर्तव्य, न्याय-अन्याय, नीति-अनीति, सार-असार आदि का सही-सही ज्ञान होता है।

साधक स्वयं के मन में एक भावना अटलतापूर्वक दृढ़ कर रखें कि, 'मैं सत्य को ही ग्रहण करूँगा असत्य की राह कभी भी ग्रहण नहीं करूँगा।" ऐसी भावना की दृढ़ता से व्यक्ति कभी भी सत्य से विचलित नहीं होता है। जो व्यक्ति सत्य की इच्छा न कर, स्वार्थमय भौतिक सुख एवं सत्ता की इच्छा रखता है, खुद को जो अच्छा लगे वह अधर्मपूर्ण, अन्याययुक्त, असत्यपूर्ण हो तथापि उसे ग्रहण करता है, उसकी साधना निष्फल होती है।

जिस व्यक्ति को किसी भी प्रकार का भय सताये, वह व्यक्ति संपूर्णतः सत्यनिष्ठ नहीं बन सकता है।

मृत्यु के भय से प्रायः व्यक्ति सत्य को छोड़कर असत्य ग्रहण कर, स्वयं का निरर्थक बचाव करने का प्रयत्न करता है। परंतु ऐसे प्राणांत के भय के समय भी निर्भय होकर केवल सत्य का ही ग्रहण करता है वह विरल व्यक्ति है एवं प्रभुकृपा का पात्र है।

मान-अपमान, लाभ-हानि, प्रिय-अप्रिय, अनुकुल-प्रतिकुल, सुख-दुःख, हर्ष-शोक आदि द्वंद्वों से प्रभावित होनेवाला व्यक्ति मात्र सत्य को ही लगे रहने में समर्थ नहीं हो सकता।

सत्यनिष्ठ व्यक्ति मृत्यु को हँसते हुए स्वीकार करेगा, परंतु प्रभु की उपासना, निष्ठा तथा आज्ञा से कदापि विचलित नहीं होगा।

सत्यनिष्ठ साधक अन्य को ज्ञानोपदेश करता रहे और निज जीवन में उस उपदेश को चरितार्थ न करे ऐसी स्थिति वह हरगीज़ नहीं सह सकता है। वह अपने आचरण में उतारने का अविरत प्रयत्न करता ही रहेगा। दंभ-दिखावे को जीवन में कभी भी स्थान नहीं देगा।

जागृत व्यक्ति ही सत्य का पालन कर सकता है। अन्यथा मोहवश व्यक्ति अज्ञानपूर्वक अधिकाधिक असत्य का आचरण करता है।

ज्ञानपूर्वक असत्य का आचरण करने के पश्चात जो व्यक्ति स्वयं के दोष का स्वीकार नहीं करता तथा उस दोष को छिपाने का मिथ्या प्रयास करता है, उस दोष को दूर करने में विलंब करता है तो उसमें कुसंस्कारों की दृढ़ता अधिकाधिक होती है, जो उसको अधिक बंधन में जकड़ती है।

व्यक्ति में सत्य अपने आप टिका नहीं रहता है। उसे प्रयत्नपूर्वक टिकाना पड़ता है। प्रभु में, सत्पुरुष में अचल श्रद्धा सत्य को टिकाने का प्रेरक बल प्रदान करती है।

परमात्मा द्वारा निर्मित व्यवस्था में केवल सत्य की जीत होती है - 'सत्यमेव जयते', जब कि मानव निर्मित व्यवस्थामें असत्य एवं अन्याय समाविष्ट है। उसमें कभी उसकी जीत होती हो ऐसा प्रतीत होता है, परंतु अंतिम हार-जीत का फैसला प्रभु के दरबार में होता है। यहाँ जीत का विशद् अर्थ आत्यंतिक मोक्ष की प्राप्ति है और हार का अर्थ, सांसारिक और जन्म-मृत्यु रूप संसृति का बंधन है।

सुनी हुई या देखी हुई कोई घटना किसी व्यक्ति के लिये कुछ अधिक या कुछ कम कहना, वास्तविकता से अतिशयोक्ति करना या अल्पोक्ति करना अथवा व्यंगात्मक रुप से कहना या अस्पष्ट रुप से कहना ये सभी असत्य के अलग-अलग प्रकार हैं। वाणी में राग - द्वेष, अहंकार या असत्य मिश्रित होता है तो वह व्यक्ति की वाणी को निर्बल एवं निर्वीर्य बनाता है। अतः साधक के लिये यह अत्यावश्यक है कि वह असत्य का आश्रित न होकर सत्य को ही ग्रहण करें।

किसी प्रतिज्ञा, नियम या व्रतपालन के लिये संकल्प उद्भवित हो अथवा किसी को किसी प्रकार का वचन दिया हो, उसका आलस्य - प्रमाद के कारण आचरण द्वारा पालन न करे, तो वह दैहिक असत्य है। ऐसा दैहिक असत्य आचरण शारीरिक शक्ति को क्षय करता है, मन तथा शरीर की संवादिता में कमी उत्पन्न करता है, जिससे मनोबल भी तूटता है। अतः जिसे सत्याचरण करना हो उनको स्वयं के ईष्टदेव के पास या सत्पुरुष के पास सत्याचरण का दृढ़ संकल्प करना चाहिए तथा उसके अनुसार इसके पालन में अड़िगता पूर्वक, निष्ठा से लगे रहना चाहिए। ईष्टदेव या सत्पुरुष के पास किया गया दृढ़ संकल्प सत्य के पालन में सबल सहारा बनता है एवं साथ-साथ कवच भी प्रदान करता है।

अन्याय, अधर्म, अनीति और असत्य का आवश्यकतानुसार संघर्ष कर प्रतिकार करना या अस्वीकार करना भी सत्य के आचरण का महत्वपूर्ण अंग है। अन्याय, अधर्म, अनीति और असत्य का आचरण जिस प्रकार अपराध है, उसी प्रकार असत्य और अन्याय के सामने झूकना या उसके आधीन हो जाना भी कायरतापूर्ण अपराध है। असत्य और अन्याय के समक्ष शूरवीर होकर प्रतिकार करना भी सत्य का ही आचरण है।

शब्दों का प्रमाण भौतिक वैज्ञानिक तथा प्रबुद्ध - प्रज्ञावान सत्पुरुष दोनों का स्वीकार्य माना जाता है, परंतु सत्य की मात्रा पूर्ण रूप से सत्पुरुष के शब्दों में होती है, जब कि भौतिक वैज्ञानिक स्वयं के किसी स्वार्थ की पूर्ति खातिर या पक्षपात रूप असत्य का आधार भी ले सकता है।

सत्य ईश्वर का ही रूप है, परंतु जो व्यक्ति ईश्वर के पाने के प्रयत्न में प्रमादी है, परंतु सत्य में निष्ठा रखता है तथा सत्यपरायण जीवन जीता है। वह अंततः निश्चित रूपसे ईश्वर को प्राप्त करता है।

प्रभु या सत्पुरुष जिसे प्रमाणित करते हैं यही सत्य है। जिसे प्रमाणित नहीं करते वही असत्य है, क्योंकि हमें जो सत्य लगता है वह वास्तव में असत्य भी हो सकता है, जो असत्य लगता हो वह वास्तव में सत्य हो सकता है। अतः सत्य-असत्य का अंतिम निर्णय परमात्मा के हस्तक है। जिस का कारण परमात्मा ही सर्वज्ञाता एवं स्वयं पूर्ण सत्य है।