५. सम्यक दृष्टि
भविष्य में चाहे जितनी भी सफलता मिले, किन्तु उस आशा से वर्तमान में निज लक्ष्य तथा कर्तव्य के प्रति गैरजिम्मेदारी रखना आलस एवं प्रमाद है, जो लक्ष्य सिद्धि में विघ्नरूप होता है।
हमारा कर्तव्य जगत के लौकिक व्यक्तिओं के साथ संबंध बनाये रखना नहीं, अपितु सत्पुरुष के साथ संबंध बनाये रखना है। लौकिक व्यक्ति से संबंध लक्ष्य से विचलित करता है, जब कि सत्पुरुष के साथ संबंध आत्यांतिक मोक्षरुपी लक्ष्य को सिद्ध करवाता है।
हमारे कार्यों के लिये जगत-समाज क्या सोचेगा? यह न देखें, अपितु प्रभु क्या सोचेंगे? यह देखना अधिक महत्त्वपूर्ण है। जगत की दृष्टि को सत्य मानने से क्या लाभ होगा? अगर प्रभु की दृष्टि में कार्य अयोग्य हो।
परमात्मा की दृष्टि में जो अयोग्य है, वह अयोग्य ही है एवं परमात्मा की दृष्टि में जो योग्य वह योग्य ही है। योग्य अयोग्य की कसौटी परमात्माकी दृष्टि से है, न कि जगत की दृष्टि से।
कोई भी कार्य करने से पहले यह जाँचे कि यह कर्म प्रभु की पसंद का है? उसमें उनकी प्रसन्नता है? अगर इसका उत्तर हाँ है तो कार्य करें और ना हो तो न करें।
जिस प्रकार सामान्य लौकिक व्यक्ति को संसार के दुःखो के प्रति घृणा तथा अनिच्छा उपजित होती है। उसी प्रकार साधक को इन्द्रियों के पंचविषय संबंधित भोगों के प्रति घृणा एवं अनिच्छा उपजित होती है। जो साधक प्रथम से ही उसे दुःखदायी जानकर उसे पाने की इच्छा नहीं करता, वह सफल होता है।
सामान्य साधक यह सोचता है कि मैं प्रभु प्राप्ति के मार्ग पर चलना तो चाहता हूँ, परंतु मुझ में इतना सामर्थ्य नहीं है। ऐसे नकारात्मक विचार कायरता लाते हैं। सच्ची आवश्यकता वाला साधक अल्प सामर्थ्य तथा मर्यादा के रहते हुए भी हिंमतपूर्वक उस राह पर चलेगा, सामर्थ्य बढाने की निष्ठापूर्वक कोशिश करेगा। ऐेसे साधक को परमात्मा की ओर से अवश्य ही सहायता मिलती है।
सच्चा साधक आत्मपरीक्षण के साथ-साथ अन्य का परीक्षण करते रहता है तथा उनकी तुलना स्वयं के साथ करता है। उनमें सद्गुण प्रतीत होते हैं, उनको ग्रहण करता है तथा दोष प्रतीत होते हैं, उनका त्याग करता है, परंतु उनके प्रति द्वेषभाव नहीं रखता है।
किसी व्यक्ति के कुछ गुणों को देखकर उसके दोषों को भी गुण मानने की गलती नहीं करनी चाहिए। उसी प्रकार किसी व्यक्ति के कुछ दोषों को देखकर उसके गुणों को भी दोषरुप मानने की गलती भी नहीं करनी चाहिए। जो व्यक्ति गुण-दोष का यथार्थ पृथक्करण नहीं कर सकता वह सफल नहीं हो सकता।
किसी के पास से किसी भी अपेक्षा से पूर्व उसकी योग्यता, सामर्थ्य तथा मर्यादा को ध्यान में लेना आवश्यक है। अन्यथा समय एवं शक्ति का व्यय होता है।
आध्यात्मिक साधना को कष्टरुप समझने के स्थान पर कर्तव्य समझने से ही उसमें सफलता प्राप्त होती है।
परमात्मा से डरकर साधना पथपर चलने के स्थान पर निर्भय होकर समझदारी तथा विवेकपूर्वक जागरुक रहकर चलना अधिक इच्छनीय है।
कई लोग संयोग तथा घटनाओं को अभूतपूर्व मानकर उनसे अत्यंत प्रभावित हो जाते हैं, परंतु उनसे प्रभावित या विचलित न होने वाला तथा स्थितप्रज्ञ रहने वाला ही सफलता प्राप्त करता है।
प्रत्यक्ष अनुभव या प्रमाण के बिना किसी भी व्यक्ति के लिये मिथ्या अनुमान करना, मानसिक पाप है। जब तक उसका अनुभव न हो, तब तक कोई अभिप्राय देना योग्य नहीं है। प्रमाण या अनुभव के बिना किसी भी व्यक्ति के लिये मिथ्या धारणा करने से उस व्यक्ति के प्रति द्वेष, कुभाव, अवगुण, हीनता, उपहास, अवज्ञा आदि की भावना उद्भवित हो सकती है। उससे साधक को आध्यात्मिक प्रगति में बाधा उत्पन्न होती है।
मिथ्या आक्षेप हुए हो, तब साधक स्वयं का अपमान समझकर प्रतिकार न करे। क्योंकि साधक को मान-अपमान रहित होना है, परंतु प्रतिकार इसलिए करना है कि ऐसा न करने पर असत्य को पुष्टि मिल जाती है।