१४. उपासना

उप अर्थात् समीप एवं आसन अर्थात् बैठना परमात्मा के अखंड सांनिध्य में रहना। उस का सर्वोच्च अर्थ यह है कि परमात्मा के स्वरूप के साथ संपूर्ण ऐक्य कर, तद्रूप हो कर, उस दिव्य स्वरूप संबंधित अनिर्वाच्य परमानंद की, शाश्वत सुख की अखंड अपरोक्षानुभूति (साक्षात्कार अनुभूति) करना।

मन परमात्मा के ध्यान तथा ज्ञान में सुस्थिर न हो, तब तक उपासना परिपक्व नहीं हो सकती है। ध्यान के समय मन की वृत्तियाँ विषयों में यहाँ - वहाँ भटकती है। तब साधक को समझना चाहिए कि अभी उपासना में कमी है, क्योंकि प्रभु के सिवा अन्य कहीं वृत्ति लगने से उपासना वस्तुतः सिद्ध नहीं होती है।

पंचविषय के विविध भोगों में आसक्ति है तब तक प्रभु में अनुराग और पराप्रेम निष्पन्न नहीं होता है। जब तक सभी जगह से सम्यक् वैराग्य प्राप्त कर मात्र प्रभु में ही अनुराग उत्पन्न नहीं होता तब तक शुद्ध उपासना ही कहाँ हुई है? जो है केवल भ्रांति ही है मात्र वाच्यार्थ है, लक्ष्यार्थ नहीं है।

प्रभु प्राप्ति की साधना में आलस्य -प्रमाद आने से कर्तव्य परायणता, आज्ञा पालन, आदि में शिथिलता आये, मन विषय भोगों में आकर्षित रहे तब उपासक को समझना चाहिये कि उसकी उपासना कहने भर की है। उसमें दृढ़ता या परिपक्वता नहीं है। अतः अभी सघन प्रयत्न की आवश्यकता है।

विपरित देशकाल में प्रभु के सर्वोपरि स्वरूप के सिवा अन्य देव-मंत्र-जंत्र-विद्या आदि में लेश मात्र प्रतीति आए, तो वह अन्याश्रय होने से प्रभु की सर्वोपरि शुद्ध उपासना सिद्ध नहीं हो सकती है। अतः सत्पुरुष के पास से शुद्ध उपासना समझ कर उसे सिद्ध करने के लिए प्रयत्नशील होना चाहिए।

चैतन्य के आत्यांतिक मोक्ष Ultimate Liberation के लिये, सर्व कारण के कारण, सर्व अवतारों के अवतारी, सर्वोपरि परब्रह्म परमात्मा, पूर्ण पुरुषोत्तमनारायण के स्वरूप की शुद्ध उपासना की नितांत आवश्यक्ता है। ऐसी उपासना परमात्मा के साक्षात्कारवाले अनुभवी सत्पुरुष के अनन्यभाव से किये गये सेवा -समागम द्वारा ही उपलब्ध होती है।

परमात्मा के दिव्य स्वरूप का साक्षात्कार करने के हेतु भगवान स्वामिनारायणने श्रीमुखवाणी 'वचनामृत' में प्रभु के स्वरूप की उपासना तथा स्वरूप का ध्यान, इन दो बातों को अत्यंत आवश्यक कहा है। इस पर से फलित होता है कि शुद्ध उपासना साधक के लिये कितना मायने रखती है।