१३. मनोनिग्रह
मन का निग्रह, उस पर नियंत्रण धर्म, ज्ञान, वैराग्य, भक्ति यह साधन चतुष्टय तथा सत्य, अहिंसा, संयम, निर्मलता, निर्भयता आदि प्रभु के कल्याणकारी गुणों की सिद्धि के लिये अतिआवश्यक है।
मन का निग्रह होते ही विषयों की ओर अग्रसर होती इन्द्रियों की वृत्ति निजविषय में से पुनरावर्तित हो कर, प्रत्याहार पाकर आत्मा - परमात्मा के स्वरूप में स्थिर हो सकती है।
एकांत में मनोनिग्रह करने की पूर्व भूमिका रूप वृत्तियों की एकाग्रता, सरलता से सिद्ध हो सकती है। क्योंकि अन्य पदार्थो के आलंबन का अभाव होता है। तथापि अविरत जागृति एकांत में भी आवश्यक है, अन्यथा एकांत में भी दोष उद्भवित होते हैं।
जिसे सांसारिक भोगों में तथा संबंधो में अधिक आसक्ति है। उसे मनोनिग्रह करने में अत्यंत संघर्ष करना पड़ता है। फलस्वरूप उसे थकान अधिक लगती है, तनाव भी महसूस होता है, परिणाम स्वरूप अधिकांश तौर पर साधना को मझधार में ही छोड़ देता है, परंतु हिंमत हारे बिना प्रयत्न चालु रखे, तो प्रभु तथा सत्पुरुष की प्रसन्नता होने से मन का नियंत्रण - निग्रह निश्चित रूप से कर सकता है।
मनोनिग्रह के बिना आत्मशुद्धि, एकाग्रता, स्वतंत्रता, निर्भयता, निश्चिंतता, चित्त की प्रसन्नता, आनंद, शांति आदि संभव नहीं है।
मन को चैतन्य न मान कर जड़ मानने से तथा निजस्वरूप को चैतन्य - आत्मा रूप मानने से, मन आदि जड़ पदार्थो से अत्यंत विलक्षण मानने से, मन की वृत्तियाँ नियंत्रण में आ जाती है। इसके लिये आंतरिक दृष्टि का अस्खलित अभ्यास अति आवश्यक है।
आध्यात्मिक साधना में त्वरित गति से विकास करना हो, तो साधक को साधना की शुरूआत से ही मन, बुद्धि, चित्त इत्यादि, अंतःकरण तथा इन्द्रियों पर नियंत्रण करने की युक्ति सत्पुरुष के पास से सीखकर शुरूआत करनी चाहिए।
'जीतं जगत केनः मनोही येनः' जिसने मन का निग्रह कर मन को परिपूर्ण रूपसे जीत लिया है। उसके लिये समस्त जगत जीता हुआ है। समग्र विश्व तथा प्रकृति उसके नियंत्रण में आ जाती है।