१०. मुकाम दसवाँ : मन की मर्यादाएँ
हमारा समस्त जीवन एक एक अटूट योग है। परंतु वह सार्थक तब ही हो, जब उसमें एक सूत्रता और संवादितता कायम हो। हम जीवन को पूर्ण रूप से जीने के स्थान पर टुकड़ों में विभाजित कर देते है। व्यापारिक जीवन में हम नैतिकता को छोड़ कर धन उपार्जन करते है, जबकि सामाजिक जीवन में सज्जनता का नकाब पहन कर उज्जवल होने का दंभ करते है, आध्यात्मिक जीवन में हम परमात्मा की प्राप्ति के लिये व्यर्थ प्रयत्न करते है। जीवन का एक हिस्सा मन को नैतिक स्तर पर नीचे ले जा कर अधोगति की ओर धकेलता है तो अन्य हिस्सा मन का ऊर्ध्वीकरण कर उसे आत्म कल्याण के परम पथ पर ले जाता है। इस विरोधाभास के कारण सारा जीवन पूर्ण होने तक मन का रूपांतर जरा भी होता नहीं है। मन वैसा का वैसा ही रहता है।
जीवन सदैव समस्त रूप से जीना चाहिये। जैसा मन व्यवसायमें, वैसा ही व्यवहार में और वैसा ही धर्मकार्य में रहना चाहिये। अर्थात् शुद्ध सत्व में रहकर ही व्यवसाय, व्यवहार और प्रभुभक्ति करनी चाहिये। विपरित संयोग में भी मन की एक सूत्रता का जतन करना हो तो सदैव निज अंतरात्मा की आवाज़ का अनुसरण करना चाहिये। मन की सबसे बड़ी मर्यादा यह है कि वह एक आज्ञांतिक सेवक (Obedient servant) परंतु अनाड़ी मालिक है। परिणाम स्वरूप जो व्यक्ति मन की गुलाम बन जाती है, उसका मन सतमुख विनाश कर देता है। मन के बस में होकर विनाश की ओर जाती व्यक्ति को अंतरात्मा बार-बार टोकती है, परंतु अंतरात्मा की आवाज़ की अविरत अवगणना करने से वह अंततः सुषुप्त होकर शांत हो जाती है। जो व्यक्ति निज अंतरात्मा की आवाज न सुन सकती हो उसे तुरंत ही सावधान हो कर जागृत मुक्तात्मा का आश्रय लेकर उनकी अनुज्ञा में रह कर स्वयं की सोई हुई अंतरात्मा को जगानी चाहिये।
मन जैसे अनाड़ी मालिक की गुलामी में से छूट कर उसे स्वयं का आज्ञांकित सेवक बनाना हो तो मन की मर्यादा को सम्यक् भाव से समझ लेना जरुरी है। भगवान श्री स्वामिनारायण ने स्वयं के धर्मग्रंथ वचनामृत में इसके बारे में अति विस्तृत चर्चा की है। श्रीहरि कहते है: मन स्त्री आदि की काम की उत्पत्ति का क्षेत्र है, वह संकलप-विकल्प रूप है (ग.प्र.12) मन में विषय संबंधी इच्छाओं की पूर्ति करने के संकल्प रहते है, यह मन के दोष है। उसे आत्मविचार के द्वारा टाले। (का.3) चित्त का स्वभाव ऐसा चिपकु है कि भले-बुरे जिन पदार्थ का स्मरण करे उनमें चिपक जाता है। उसमें उत्तम कनिष्ठ भेद परखने की विवेक बुद्धि का अभाव होने से कभी तो बिल्कुल बेकार वस्तु या विषय में चिपक कर रात-दिन चिंतवन करते रहता है। (ग.म.6)
इस प्रकार मन सदैव अहंकार एवं इच्छाओं के साथ संलग्न रहता है, अतः उसकी सभी प्रवृत्तियाँ अहंकार तथा इच्छा प्रेरित ही होती है। परिणाम स्वरूप मन को अज्ञानता का कारण भले ही न कहे, परंतु भूलों का प्रेरक अवश्य ही मान सकते है। सत्य से अलग रहने का मन का स्वभाव है। अतः कल्पित भ्रामक सत्य यानि, असत्य के संस्पर्श से मन प्रकृति विरुद्ध की प्रवृत्ति में प्रवृत्त हो कर जीवन में अधिकाधिक भूलों की परंपरा, असंवादिता, कुरूपता और विकृति लाता है।
मन की मर्यादा और दोष को गुणो में परिवर्तित कर प्रभु प्राप्ति के पुरुषार्थ में सुभग विनियोग करना हो तो आत्म विचार के साथ इंद्रियों को संयम में रखकर शब्द, स्पर्श, रूप, रस, और गंध इत्यादि पंचविषय की सर्व प्रवृत्तियाँ परमात्मा संबंधित ही करनी चाहिये। आँखों से परमात्मा का स्वरूप दर्शन, नाक द्वारा परमात्मा ने अंगीकार किये हुए पत्र-पुष्प तथा प्रसाद की सुगंध का सेवन, कान द्वारा भगवद लीला चरित्र तथा आध्यात्म ज्ञान श्रवण, जीभ द्वारा प्रभु के दिव्य प्रसाद का आस्वादन और नवधा भक्ति द्वारा प्रभु का पुनित संस्पर्श इस प्रकार चित्त को सर्व प्रकार से परमात्मा के स्वरूप में लीन रखने से, भ्रमर के ध्यान से कीटक भी भ्रमर हो जाती है, उसी प्रकार चित्त परमात्मा के स्वरूप में स्थिर होकर आत्मा को परमात्मा की प्राप्ति करवाती है।
लोया के दरबार सुरा खाचर भगवान स्वामिनारायण के अनन्य आश्रित थे। दरबार को भिन्न-भिन्न प्रकार के स्वादिष्ट पकवान खाने की रसासक्ति थी। परिणाम स्वरूप उनका भावुक भक्तह्रदय सदैव भोजन परायण रहता था। भगवद् भक्तों के लिये मन की ऐसी क्रिया लांछन रूप है। अतः श्रीजीमहाराज़ ने उनको ऐसा नियम दिया कि भोजन प्रसंग पर थाल में जो भी परोसा जाए उसे प्रभु प्रसाद समझ कर प्रेमपूर्वक ग्रहण कर लें। भले-बुरे, स्वाद-बेस्वाद की कोई फरियाद न करें। उनकी पत्नी को प्रभु ने आज्ञा दी कि आप दरबार को कभी स्वादिष्ट तो कभी बेस्वाद खा न सकें ऐसा भोजन परोंसे। प्रभु की आज्ञा होने से मन मसोस कर भी दरबार भोजन कर लेते। छः महिने में सुरा खाचर निर्स्वादी हो गये।
मन की सर्व मर्यादाओं को पार कर मन से परे जाने के सिवा आत्मानुभुति दुर्लभ है, इसके लिये सहजभाव-साक्षीभाव से आत्मा रूप से जीना यही एकमात्र उपाय है!