१८. मुकाम अठारहवाँ : समाधि

गुरु रामानंद स्वामी के अंतर्धान होने के पश्चात उनके चौदहवे के दिन सौराष्ट्र के फणेणी गाँव में भद्रा नदी के तट पर सभा कर भगवान श्री स्वामिनारायण ने शीतलदास नामक एक संन्यासी को समाघि करवा कर स्वामिनारायण संप्रदाय की तवारीख के अनुसार समाधि प्रकरण का प्रारंभ किया था। पश्चात समाधि की घटना श्रीजीमहाराज़ के सानिध्य का एक हिस्सा हो गई थी। महाराज़ के दर्शन से, स्पर्श से .... अरे उनकी खड़ाऊ क ी आवाज़ से भी समाधि होने लगी थी। एक बार श्रीजीमहाराज़ ने लाड़कीबाई भाट नामक एक सत्संगी स्त्री को समाधि करवाई। समाधि में अतिशय तेज को देख कर वे चीखने लगीं। महाराज़ ने उनको समाधि से बाहर लाकर समझाया: ‘तुम्हारा स्वरूप तो आत्मा है, देह नहीं है। यह लाड़कीबाई नाम और भाट की देह तुम्हारी नहीं है, अछेद्य, अभेद्य ऐसी आत्मा तुम्हारा स्वरूप है। पश्चात पुनः उसे समाधि करवा कर कहा कि मूलाधार चक्र जो गणपति का स्थानक है वहाँ चार पंखुड़ी का कमल है वहाँ जाकर तुम्हारे स्वरूप को देखो। स्त्री ने आत्मभाव से समाधि में मूलाधार में प्रवेश कर दिव्य प्रकाश देखा और प्रणवनाद सुना। पश्चात स्वाधिष्ठान चक्र जो ब्रह्मा का स्थानक है, वहाँ उससे अधिक प्रकाश देखा और भयानक नाद सुना। उससे उपर मणिपुर चक्र यानि विष्णु के स्थानक में अतिशय तेज एवं महाभीषण नाद होते हुए देखा। इस प्रकार समाधि में साधक ज्यों-ज्यों उच्च से उच्च भूमिका में जाता है त्यों-त्यों अधिकाधिक तेज के अंबार दृष्टिकृत होता है, उस समय कैसा भी धीरजवान हो, भयभीत हो जाता है, परंतु लाड़की बाई आत्मनिष्ठा एवं भगवद्निष्ठा के बल पर इस अनुभव के पश्चात समाधिनिष्ठ बन गई।

इतनी पूर्व भूमिका के पश्चात अब हम यह सोचें कि समाधि वास्तव में क्या है? मन के परिप्रेक्ष्य में इस विषय को समझें। हमारी समक्ष सामान्यतः दो भूमिकाएँ है जिसके भीतर मानव मन कार्य करता है। पहली भूमिका सचेत भूमिका है। जिसमें सभी कार्य ‘मैं करता हूँ’ ऐसी भावना से जूड़ा रहता है, जैसे जागृत अवस्था। दूसरी भूमिका है अचेत अवस्था जिसमें सभी काम ‘मैं करता हूँ’ के अहंभाव के बिना होता है। उदाहरण स्वरूप निंद्रा के दौरान शरीर की सभी क्रिया अहंभाव के बिना होती है। इन दोनों भूमिकाओं से एक उच्चतर भूमिका है, जिसमें मन ‘मैं करता हूँ’ के अहंभाव के बिना सक्रिय रूप से कार्य करता है। इस भूमिका को अतिचेतन अवस्था अथवा समाधि कहते है।

जब मनुष्य गाढ़ निंद्रा में जाता है तब वह सचेत भूमिका से नीचे की अचेत अवस्था में प्रवेश करता है। उस स्थिति में वह साँस लेने के साथ करवट बदलने जैसी शारीरिक क्रिया भी करता है, परंतु यह सब करते वक्त उसे ‘मैं करता हूँ’ का कर्तृत्व का अभिमान नहीं होता है। जब वह नींद से जागता है तब वह वही का वही व्यक्ति रहता है। परंतु जब मनुष्य समाधि में जाता है, तो समाधि में जाने से पूर्व अगर वह मूर्ख हो, जड़ हो, अज्ञानी हो, पापी हो, निष्ठुर हो तथापि समाधि में से पूर्ण ज्ञानी, पुण्यवान एवं सह्रदयी होकर बाहर आता है।

ऐसा क्यों होता है? इसकी स्पष्टता भगवान स्वामिनारायण ने ग.म. 20 वे वचनामृत में की है। जीव जब तक देह में है तब तक वह इंद्रियाँ-अंतःकरण का दृष्टामात्र ही है। वह जब समाधि में जाता है तब इंद्रियाँ-अंतःकरण के दृष्टाभाव का त्याग कर माया से परे जो ब्रह्म उसके सदृश चैतन्यस्वरूप होता है। समाधि में जीव ब्रह्मसंग तुल्यभाव प्राप्त करता होने से उसके ज्ञान की वृद्धि होती है। जिन साधकों की इंद्रियों की शक्ति तप, निवृतिधर्म तथा वैराग्य युक्त होते है, वे समाधि द्वारा नारद-सनकादि तथा शुकजी के जैसी सिध्ध् दशा प्राप्त करते है। ऐसे सिध्ध् श्वेतद्वीप, बदरीकाश्रम इत्यादि भगवान के धाम में उसी शरीर से आते-जाते है तथा लोक-अलोक सभी स्थान पर उनकी गति होती है। अष्टांगयोग के अनुसार समाधि दो प्रकार की है। (1) संप्रज्ञात समाधि, (2) असंप्रज्ञात समाधि। संप्रज्ञात समाधि में प्रकृति को बस में रखने की समस्त शक्तियाँ आती है, जबकि असंप्रज्ञात समाधि में समस्त मानसिक क्रिया के विराम के निरंतर अभ्यास द्वारा प्राप्त कर सकते है। भगवान श्रीस्वामिनारायण वचनामृत में दो प्रकार की समाधि का उल्लेख करते है। (1) सविकल्प समाधि (2) निर्विकल्प समाधि। जिसे भगवान के स्वरूप में स्थिति हुई हो उसे अशुभ वासना तो नहीं रहती है, परंतु शुभ वासना रहती है कि मैं नारद, सनकादि या शुकजी जैसा होऊँ ... इस प्रकार का जिसे विकल्प रहता हो उसे सविकल्प समाधि वाला कहते है। जिसे इस प्रकार का विकल्प न रहता हो और जो अक्षरधाम की साधर्म्यता को प्राप्त कर केवल भगवान की मूर्ति में ही निमग्न रहता हो उसे निर्विकल्प समाधि वाला कहते है। (ग.प्र.40)

एक बार वड़ताल में भादरण के एक पाटीदार ने श्रीजीमहाराज़ से प्रश्न पूछा: ‘हे महाराज़, यह समाधि कैसे होती है?’ श्रीजीमहाराज़ ने इस गहन प्रश्न का अति सरल जवाब दिया था। उन्होंने समझाया था: इस पृथ्वी पर अनेक प्रकार के पत्थर है, चुंबकत्व वाला पत्थर भी उनमें से एक पत्थर है, परंतु उसमें नैसर्गिक लौहचुंहकत्व का गुण विद्यमान है। अतः जब चुंबकत्व वाले पर्वत के पास जब जहाज आता है, तो जहाज की कीलें आकर्षित होकर पर्वत में चिपक जाती है। उसी प्रकार भगवान जब पृथ्वी पर मनुष्य रूप से अवतरित होते है, तब दृष्चिगोचर तो अन्य मनुष्य सदृश ही होते है, परंतु उनकी प्रभुता का चुंबकत्व जीव को सहज ही उनकी ओर आकृष्ट करता है। अतः जब कोई जीव श्रद्धा पूर्वक भगवान का दर्शन करता है, तब उसके इंद्रिय-प्राण भगवान के स्वरूप में खिंचे जाने से उनका चित्त समाधि में स्थित हो जाता है।

एक बार समाधि होने के पश्चात ब्रह्म के स्वरूप में से पुनः देह में सहजता से आ नहीं सकते है। मात्र तीन संयोग में ही जीव समाधि में से देह में लौटता है। (1) संसार में सुख की वासना इतनी प्रबल हो कि वह जीव को समाधि में से भी जगाती है। (2) अति समर्थ मुक्त समाधि में स्वतः आना-जाना करते है। (3) ऐसे समर्थ मुक्त अन्य को भी समाधि करवाते एवं पुनः देह में लाते है। (ग.प्र.73)

समाधि में भी कामवासना भस्म नहीं होती है। भादरा के रत्ना भक्त समाधिनिष्ठ थे, परंतु उनके अंतःकरण में से काम विकार नहीं टला था। सद्गुरु गोपाळानंद स्वामी ने उनको प्रतिलोमरूप से ध्यान करने की रीति (Technique) सिखाई थी। रत्ना भक्त ने उसके अनुसार स्वयं की आत्मा की अक्षरब्रह्म के साथ एकता कर उसमें बार-बार लोम-प्रतिलोम वृत्ति से श्रीहरि की मूर्ति का ध्यान करने लगे। परिणाम स्वरूप उनके जीव के साथ एकरस रूप भाव को प्राप्त कामवासना जलकर भस्म हो गई। इस समाधि से भी प्रतिलोम ध्यान श्रेष्ठ है! अबजीबापाश्री कहते थे कि समाधि तो सकाम मार्ग है। जो अखंड महाराज़ की मूर्ति को दृष्टिकृत करे वही वास्तविक सिध्ध् है एवं ऐसी सिध्ध् दशा ही अखंड समाधि है!