१२. मुकाम बारहवाँ : मन का निग्रह

हमारा मन बंदर सदृश चंचल है। बंदर को अगर शराब पिलाई जाये तो उसकी मस्ती अनेक गुना बढ जाती है। उस पर अगर उसे बिच्छू काट ले तो उसकी चंचलता की कोई सीमा नहीं रहती है। हमारे मन मर्कट को इच्छा एवं तृष्णा रूप शराब पिलाते है। यह कम हो तो उस पर ईर्ष्या रूप बिच्छू का दंश देते है। चंचलता की पराकाष्ठा पर पहुँचे ऐसे पागल मन को बस में रखना- उसका निग्रह करना अत्यंत दुष्कर है।

श्रीमद् भगवद्गीता में अर्जुन श्रीकृष्ण भगवान को पुछते है: ‘हे कृष्ण,मन चंचल, पीड़ाकारक, बलवान और हठीला है। अतः मन का निग्रह पवन को बस में करने जितना दुष्कर लगता है ।’ (6/34) अर्जुन का प्रश्न हम सभी काप्रश्न है। मनुष्य दिन-प्रतिदिन भौतिकवादी हो रहा है।नई-नई इच्छाओं की भरमार उसके मन को चंचलता की परिसीमा की ओर धकेलता है। ऐसे समय में श्रीकृष्ण का जवाब भी उतना ही लोकभोग्य है। श्रीकृष्ण कहते है; ‘हे महाबाहो मन बेशक अति चंचल है तथा उसे बस में करना मुश्किल है, परंतु अभ्यास और वैराग्य द्वारा उसका निग्रह संभव है ।’ (6/35)

श्रीकृष्ण का जवाब आशावादी है। मनोनिग्रह मुश्किल है, परंतु असंभव नहीं है। नृसिंह भगवान ने स्तंभ में से प्रकट हो कर प्रह्लादजी की रक्षा की तब प्रहलादजी ने कहा: ‘प्रभु, आपने इस देह की रक्षा की उसे मैं रक्षा मानता ही नहीं, क्योंकि इस देह का कभी न कभी तो नाश होगा ही। आपको मेरी आर्त प्रार्थना है कि आप मेरी काम, क्रोध, लोभ, मोह, मत्सर, ईर्ष्या इत्यादि अंतःशत्रुओ से रक्षा करें। यही मेरी वास्तविक रक्षा है ।’ प्रहलादजी की यह प्रार्थना प्रत्येक मुमुक्षु की सनातन प्रार्थना होनी चाहिये। हमारी प्रार्थना अगर अंतरात्मा की गहनता से उद्भवित हुई होगी तो प्रभु उसे अवश्य ही सुनेंगे। अंतःशत्रु जीतने से वैराग्य के वन में हमारा प्रवेश निश्चित रूप से हो जाता है।

भगवान श्री स्वामिनारायण ने वैराग्य की सूत्रात्मक व्याख्या देते हुए शिक्षापत्री में लिखा है: ‘भगवान के बिना अन्य पदार्थ में प्रीति उसे वैराग्य कहते है ।’ जगत की अनित्यता का स्वाभाविक स्वीकार जब अंतःकरण से होता है, तब सर्व सुख की निधि परमात्मा के सिवा,सर्व विषयमें से अंतरात्मा शुष्क हो जाती है। हमारे शारीरिक, मानसिक, आर्थिक और सामाजिक संयोगो में होती जबरदस्त उथल-पुथल मन को कभी वैराग्य की ओर ले जाती है। वैराग्य एक ऐसी अग्नि है, जो मन को तप्त कर शुद्ध करती है। मन जितना शुद्ध होता है उतना उसे बस में करना आसान होता है। मन का संयम उसकी विशुद्धि पर निर्भर है। हमने पहले दृष्टिकृत किया कि मन अन्नमय है। अतः हमारे मन की शुद्धि का आधार हमारे आहार पर भी है। आहार का अर्थ यहाँ सिर्फ अन्न न लेकर इन्द्रियों के आहार के संदर्भ में विचारा जाए तो यह निष्कर्ष निकलता है कि मनोनिग्रह का एक मूलभूत उपाय है कि राग द्वेष या मोह उत्पन्न करे ऐसा आहार इन्द्रियों को न दें। सात्त्विक आहार मनुष्य के राग द्वेष और मोह मंद करने में सहायक होते है।मनुष्य सत्त्वगुण द्वारा रजस और तमस उभय गुणों को बस में करना चाहिये। पश्चात सत्त्वगुण को भी शुद्धसत्त्वगुण द्वारा बस करना चाहिये। सत्त्व में से शुद्ध सत्त्व में तथा उसमें से गुणातीत स्थिति में मन को ले जाना चाहिये।

भगवान श्रीस्वामिनारायण वचनामृत (ग.प्र.38) में कहते है: ‘हमने तो यह माना है कि मन निर्वासनिक होना चाहिये। देह के द्वारा चाहे कितनी ही प्रवृत्ति हो, परंतु उसका मन अगर शुद्ध है तो उसका अति बुरा नहीं होता है..... भरतजी को अंत समय में मृग के बच्चे का स्मरण हुआ तो मृग के आकार से हो गये, पहले राज्य का त्याग किया था और ऋ षभदेव भगवान उनके पिता थे तथापि ऐसा हुआ था। अतएव मन से निर्वासनिक रहें यह हमारा मत है..... गृहस्थ देह से व्यवहार करें और मन से त्यागी की सदृश ही निर्वासनिक रहें.... जनक जैसे राजा थे वे राज्य करते परंतु मन तो महान योगेश्वर जैसा था, अतः मन से किया हुआ त्याग ही योग्य है ।’

श्रीकृष्ण भगवान श्रीमद् भागवत् में कहते है: ‘जगत में जितनी आसक्ति है, सत्संग उनका नाश कर देता है। व्रत, यज्ञ, वेद, तीर्थ और यमनियम भी सत्संग जितने मन को बस में करने में समर्थ नहीं है ।’ सत्संग मनोनिग्रह सरल बनाता है। भगवान स्वामिनारायण भी वचनामृत में (का.12) कहते है: ‘कैसा भी कामी, क्रोधी, लोभी, लंपट जीव हो अगर ऐसी बात को प्रीति पुर्वक सुने तो उसके सर्व विकार टल जाते है। जिस प्रकार किसी के दाँतों में पहले इतनी ताकत रहती है कि कच्चे चने चबा जाए, वह अगर कच्चे आम अधिक खाये तो भात भी खाना मुश्किल हो जाता है। उसी प्रकार चाहे कितना ही कामादि में आसक्त पुरुष, इस प्रकार की बात को आस्तिक होकर श्रद्धा सहित सुनें तो वह पुरुष विषय सुख भोगने में समर्थ नहीं रहता है। तप्तकृच्छ-चांद्रायणादि व्रत के द्वारा अगर देह को सुका दे, तथापि ऐसी भगवद् वार्ता सुनने वाले का मन जितना निर्व्यसनी होता है, वैसा नहीं होता है। श्रद्धा सहित सत्शास्त्र का श्रवण-मनन मनोनिग्रह का अचूक साधन है।

योगशास्त्र आग्रह पूर्वक कहते है कि मनोनिग्रह के लिये मुमुक्षु को यम-नियम का अभ्यास करना चाहिये। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह इन सभी को यम कहते है। जिसे भगवान श्री स्वामिनारायण के अनुयायी सत्संगी पंचवर्त्तमान के नाम से जानते है। हरजी ठक्कर नामक एक सत्संगी ने एक बार भगवान श्रीस्वामिनारायण से प्रश्न पूछा: ‘भगवन्, निष्काम वर्तमान(ब्रह्मचर्य ) किस प्रकार अतिशय दृढ़ हो?’ निष्काम व्रत दृढ़ करने के श्रीजीमहाराज़ ने तीन उपाय बताये। जिसमें सर्व प्रथम उपाय था मन को बसमें करना। मनको किस प्रकार बस में करे इसका उपाय बताते हुए श्री हरि ने कहा: ‘मन में अविरत यह मनन करें कि मैं आत्मा हूँ, देह नहीं। दूसरा भगवान की कथा श्रवणादि जो नवधा भक्ति उसमें मन को अखंड संलग्न रखें। क्षणमात्र भी मन को व्यर्थ न रहने दें। जिस प्रकार किसी पुरुष ने भूत को बस में किया था, उसे अगर काम न बताये तो खाने तैयार हो जाता था। उसी प्रकार यह मन भी भूत की सदृश है, उसे जब भगवद् भक्ति में न रखें तो अधर्म के विचार करता है, तब वह भूत की सदृश खाने को तैयार हुआ कहा जाए। अतः मन को सदैव भगवान की कथा-कीर्तनादि में संलग्न रखें। इसे मन बस में हुआ कहा जाए ।’ (ग.प्र.33)

हमारा मन जब विक्षिप्त हो, तब हमारी साँस अधिक वेग से तथा अनियमित चलती है। मन को शांत करने का एक उपाय श्वासोच्छवास को नियमित करना है। प्राणायाम का अभ्यास मनोनिग्रह में अत्यंत सहायक होता है। परंतु जो ब्रह्मचर्य का पालन न करते हो तथा जिनका ह्रदय, फेफडे, और स्नायुतंत्र कमजोर हो उन्हें प्राणायाम का अभ्यास नहीं करना चाहिये।

परमात्मा का ध्यान ही मनोनिग्रह का सबसे असर कारक साधन है, परंतु उसमें भी विनियोग अत्यंत आवशयक है। इसके लिये भगवान श्रीस्वामिनारायण कहते है: ‘जब मन में सत्त्व गुण हो उस समय भगवान की मूर्ति का ध्यान करना चाहिये, तमोगुण हो तब कोई विचार न हो तथा शून्य सदृश रहे, उस समय भगवान का ध्यान न करें एवं जब रजोगुण हो उस समय संकल्प-विचार अधिक हो उस समय भी भगवान का ध्यान न करें। (ग.प्र.32)

एक बार परम पूज्य गुरुवर्य अ.मु. नारायणभाई के पास एक वृद्ध मुमुक्षु आकर पूछने लगे: ‘भाई, मुझे ध्यान करना है, परंतु मन ध्यान में लगता नहीं है। आप कुछ उपाय बतायें ।’ गुरुवर्य ने मंद स्मित के साथ कहा: ‘भगवान का अखंड अनुसंधान करने की कोशिश करें। उठते-बैठते, खाते-पीते, श्रीहरि का नाम स्मरण करते रहे, यह भी ध्यान ही है!’ मन को बस में करने का इससे सरल और अचूक उपाय शायद ही कोई हो। जप यानि नामस्मरण दीर्घ काल पर्यंत किया जाए तो मन उसके निर्मल सहज स्वरूप में आकर पूर्व की सर्व वृत्तिओं तथा वासना को फेंक देता है!