१६. मुकाम सोलहवाँ : मन का ऊर्ध्वीकरण

शास्त्रों में कहा है कि पृथ्वी, जल,तेज, वायु, आकाश, अहंकार और महतत्त्व इन सप्त आवरण को जो भेद सकता है वही ब्रह्मरूप होकर परमात्मा की कृपा का पात्र बनता है, इन सप्त आवरणों को कैसे भेदा जाए? इस प्रश्न का यथार्थ उत्तर समझने के लिये दीर्घ पूर्व भूमिका बनानी पड़ती है।

हमारा शरीर अखिल ब्रह्मांड की छोटी आवृत्ति की तरह है। अतएव कहा गया है कि या पिंडे सा ब्रह्मांडे। भगवान श्री स्वामिनारायण वचनामृत में कहते है: ‘इस ब्रह्मांड में जैसा कारखाना है वैसा ही इस पिंड में भी है . पिंड में अल्प है और ब्रह्मांड में महत्त है। जैसा इस पिंड का आकार है वैसा ही ब्रह्मांड का भी आकार है। जिस प्रकार ब्रह्मांड में नदियाँ है उसी प्रकार पिंड में नाड़ियाँ है। जिस प्रकार ब्रह्मांड में सागर है उसी प्रकार पिंड में कुक्षि में जल है। जिस प्रकार चंद्र-सूर्य है उसी प्रकार पिंड में इड़ा-पिंगळा नाड़ी में चंद्र- सूर्य है, इत्यादि सामग्री जिस प्रकार ब्रह्मांड में है उसी प्रकार पिंड में है तथा इंद्रियों की नाड़ियाँ है उनकी ब्रह्मांड के साथ एकता है ।’ (ग.प्र.65) जिस प्रकार चौदह लोक का ब्रह्मांड सप्त आवरण से घिरा हुआ है, उसी प्रकार हमारी आत्मा भी अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनंदमय कोष जैसे पंच आवरण से आवृत है। ये आवरण या कोष आत्मा नहीं है। उस पर आच्छादन है। जीव अज्ञानवश इन आवरणों को ही आत्मा मानकर उसके अनुसार वर्त्तन करता है।

अन्नमय कोष यानि हमारा स्थूल शरीर। उसका आधार अन्न है। अतएव अन्नमय कोष कहते है। स्थूल शरीर के जैसे ही आकार का प्राणमय शरीर है। जिसे अंग्रेजी में Etheric double अथवा Aura कहते है। रशिया के डॉ. किरलियन ने हमारे ऑरा यानि आभामंडल के फोटो खिंचने की तकनिक का विकास किया है। डॉ.किरलियन ने प्राणमय कोष को देखने के लिये ऑरोस्पॅक नामक चश्मे बनाये है। इन चश्मों को पहन कर हम किसी भी व्यक्ति के प्राण शरीर के ऑरा को स्पष्ट रूप से देख सकते है। प्राणमय कोष हमारी इंद्रियों का आधार है, जिस व्यक्ति की चेतना प्राणशरीर में रहती हो उसे इंद्रियो के विषय में विशेष अभिरुचि रहती है। प्राणमय कोष से सूक्ष्म मनोमय कोष है। जिसका मुख्य अंग मन है। मनोमय कोष में जीने वाले व्यक्ति को स्थूल भोगों की अपेक्षा मानस भोग अधिक प्रिय लगते है। मनोमय से सूक्ष्मत्तर विज्ञानमय कोष में श्रद्धा, सत्य और एकाग्रता जैसे सत्त्वगुण का प्राधान्य होता है। मनोमय एवं विज्ञानमय संलग्न होकर अंतःकरण बनाते है। पाँचवा आवरण आनंदमय कोष शुद्ध सत्त्व की आत्मा की सर्वाधिक निकट की अवस्था है।

ब्रह्मांड की एक शक्ति सूर्य है तो दूसरी चंद्र है। मानव शरीर में भी सूर्य और चंद्र – पिंगळा और इड़ा नाड़ी द्वारा श्वासोच्छवास लेते है। हमारा योग विज्ञान कहता है कि दिमाग में से मुख्य तीन नाड़ियाँ निकलती है। इडा, पिंगळा और सुषुम्णा। तबीबी विज्ञान भाषा में बायें अनुकंपी ज्ञानतंतु (Left sympatheic nerves) इड़ा, दाहिने अनुकंपी ज्ञानतंतु (Right sympathetic nerves) पिंगळा और परानुकंपी (Para sympathetic nerves) ज्ञानतंतु सुषुम्णा नाड़ी से संबंधित है। ये नाड़ियां मस्तिष्क में से नीचे उतरती है तब एकदूसरे के साथ चोटी की तरह बुनकर उतरती है। करोड़रज्जु में इसकी बुनाई सात जगह पर होती है। जिस जगह पर बुनाई होती है उस जगह पर गंठन जैसा होता है। इस गंठन के साथ हमारे सूक्ष्म शरीर में स्थित सात चक्र यानि शक्ति केंद्र संबंधित है। इन चेतना केन्द्रो द्वारा प्राणशक्ति सूक्ष्मशरीर में से स्थूल शरीर में आना-जाना करती है। इन चक्रों के नाम है (1) मूलाधार चक्र, (2) स्वाधिनास्थ चक्र, (3) मणिपुर चक्र, (4) अनाहत चक्र, (5) विशुद्ध चक्र, (6) आज्ञा चक्र और (7) सस्त्रार चक्र। सूक्ष्म शरीर में जहाँ-जहाँ ये चक्र स्थित है वहाँ-वहाँ मूल शरीर में अंतःस्त्रावी ग्रंथी है।

मूलाधार चक्र का स्थान सीव के पास गुदा के पास है। उसके पास काम के केन्द्र है। मूलाधार में पृथ्वी तत्त्व का प्रभुत्व है। मूलाधार से उपर उदर के भाग में स्वाधिष्ठान चक्र जलतत्व प्रधान है। नाभि के पास मणिपुर चक्र में अग्नितत्त्व समाया हुआ है। उसमें गति अवरोध होने से शरीर में अग्नि तत्त्व बढ़ जाने से अतिसार तथा दाह की तकलीफ होती है। चौथा अनाहत चक्र छाती में ह्रदय के पास है। उसमें वायु तत्त्व का प्राधान्य है। अनाहत चक्र जिसमें निष्क्रिय हो वह मनुष्य क्रूर और निर्दय होता है। आखिरकार वह डिप्रेशन का भोग बनता है। गले में कंठस्थान में विशुद्ध चक्र में आकाशतत्त्व प्रधान है। हमारी दोनों भ्रकुटी के मध्य में जहाँ तिलक किया जाता है, वहाँ आज्ञा चक्र है। अहंकार उसका मुख्य तत्त्व है। सातवाँ सहस्त्रार चक्र मस्तिष्क में तालु के पास है। वह चित्त का स्थान है। योगशास्त्रानुसार मूलाधार के पास कंद नामक स्थान है। उसमें साढ़े तीन चक्कर लगाये सर्पाकार कुंडलिनी शक्ति बिराजमान है। योगाभ्यास और ध्यान द्वारा यह कुंडलिनी जागृत होकर उपर्युक्त सातों चक्र का भेदन कर जब सहस्त्रार में पहुँचती है तब मन का ऊर्ध्वीकरण होने से आत्मानुभूति होती है।

इतनी संक्षिप्त भूमिका के पश्चात अब हम मुख्य प्रश्न पर आते है। सप्त आवरण किस प्रकार भेदे जाते है, यह पहले तात्त्विक दृष्टि से दृष्टिकृत करें। प्रथम आवरण पृथ्वी उसकी तन्मात्रा गंध जीतने से भेदी जाती है। अच्छी-भली गंध में से वृत्ति को लौटा लेना मुश्किल है, परंतु मूलाधार चक्र जिसका जागृत हो जाता है। उससे पृथ्वी का आवरण सहज ही भेदित हो जाता है। जल का सूक्ष्म रूप (तन्मात्रा) रस है। ध्यान द्वारा स्वाधिष्ठान जागृत हो जाता है, तब रसासक्ति सहज ही जीती जाती है। तेज का तन्मात्रा रूप है। जिसका मणिपुर चक्र सक्रिय हो उससे तेज के आवरण का पलभर में उल्लंघन होता है। चौथा आवरण वायु का है। अनाहत चक्र जब खुलता है तब स्पर्श के विषय में से वृत्ति आत्मातत्त्व की ओर मुड़ती है। इसी प्रकार विशुद्ध चक्र का भेदन होने से आकाश का आवरण जीता जाता है। आज्ञा चक्र पर ध्यान करने से उसका भेदन होने से साधक गुणातीत स्थिति को प्राप्त करता है। त्रिगुणात्मक अहंकार का आवरण इस प्रकार टलता है। सातवाँ एवं अंतिम आवरण महतत्त्व का है । धर्म, भक्ति तथा ध्यान के परिपाक रूप में जब कुंडलिनी जागृत होकर सहस्त्रार में पहुँचती है तब चित्त जीता जाता है। जब चित्त में भगवान के सिवा कोई आकार न रहे, तब महतत्त्व का आवरण गया जाने। माया यानि प्रकृत्ति अर्थात् स्वभाव,जिसने स्वयं का स्वभाव जीता उसने जगत जीता। साधन के द्वारा अष्ट आवरण भेदना तो आकाशकुसुम पाने जितना दुष्कर है।

अनादि महामुक्तराज अबजीबापाश्री ने इसका सरल उपाय बताया है। परमात्मा के परम साधर्म्य पाये हुए अनादिमुक्त की अनुवृत्ति में अगर तन और मन से रहे तो कैसा भी अधम जीव भी माया के आवरण को भेद कर आत्यंतिक कल्याण को प्राप्त करता है।