७. मुकाम सातवाँ : मन की विविध अवस्थाएँ
मन स्वयं को पाँच विविध अवस्था में प्रकाशित करता है। आप को अनुभव होगा कि मन कई बार चंचल हो जाता है। उस समय कभी आनंद का तो कभी विषाद का भाव होता है। इसे मन की क्षिप्त अवस्था कहते है, क्षिप्त अवस्था में मन चारों दिशा में तितर -बितर हो जाता है। इस अवस्था में मन केवल सुख और दुःख इन दो भावों का अनुभव कराता है। यह अवस्था कुछ अच्छी है। इस समय जगत में जो आतंकवाद फैला है, उसके मूल में मन की मूढ अवस्था कारण भूत है। मूढ अवस्था अर्थात् जड़ता, इसमें मन दुसरे को नुकसान पहुँचाने वाले अभिगम वाला होता है। आध्यात्मिक साधक जब ध्यान करने की शुरुआत करता है, तब मन उसकी विक्षिप्त (क्षिप्त से विशिष्ट) अवस्था में होता है। इस अवस्था में मन केन्द्रिय भूत होने का प्रयत्न कर रहा होता है। विक्षिप्त अवस्था उच्च आत्माओं के लिये स्वाभाविक है। जब कि क्षिप्त एवं मूढ़ अवस्था सामान्य कोटि के जीवात्माओं की मनःस्थिति दर्शित करती है। मन की एकाग्र अवस्था में मन केन्द्रित स्थिति में स्थिर रहने का प्रयत्न करता है और जब एकाग्रता की पराकाष्ठा आती है, तब मन उसकी अवचेतन दशा में समाधि में लीन होता है। यह मन की निरुद्ध अवस्था है।
सामान्यतः हमारा मन मूढ़ एवं क्षिप्त अवस्था में ही रहता है। मूढ अवस्था में हम निष्क्रियता और क्षिप्त अवस्था में चंचलता का अनुभव करते है। योग साधना या भक्तियोग द्वारा इसी मन को विक्षिप्त एवं एकाग्र बनाया जा सकता है। धार्मिक यम-नियम का उद्देश्य हमारे मन को एकाग्र बनाने का है। ऐसा एकाग्र मन प्रवृत्ति के किसी भी क्षेत्र में क्रियाशील बनता है, तब उसमें प्रकाशित हो उठता है, एकाग्र मन से ही विद्यार्थी विद्याक्षेत्र में चमकता है, व्यापारी व्यापार में समृद्ध बनता है। संगीत या कला का साधक उसके क्षेत्र में सिद्धि प्राप्त करता है। मन की एकाग्रता के बिना किसी भी क्षेत्र में सफलता आकाशकुसुमवत् मुश्किल ही नहीं असंभव भी है! एकाग्रता के अभ्यास एवं इसके उत्तरोत्तर विकास द्वारा मन उसकी सर्वोच्च निरुद्ध अवस्था में अतिचेतन भूमिका पर समाधि का अलौकिक अनुभव करता है।
मनोनिग्रह द्वारा मन की एकाग्रता का क्रमशः विकास होता है। क्षिप्त या मूढ़ अवस्था में स्थित मन को कभी कोई योगी या मुक्त स्वयं के संकल्प बल से निरुद्ध अवस्था में ले जाए, तब उस सामान्य कक्षा के जीवात्मा को भी समाधि का दिव्य अनुभव होता है। भगवान स्वामिनारायण ने जब समाधि प्रकरण चलाया था, तब सिध्ध् मुक्तों से लेकर पशु, पक्षी तथा सामान्य जीव सभी को समाधि का दिव्य अनुभव एक समान रूप से होता था। हालाँकि, लाड़कीबाई नामक एक भाट स्त्री को समाधि के दौरान सुनाई देते प्रणव नाद से अतिशय भय लगा था, परंतु श्रीहरि के द्वारा उनको सम्यक् ज्ञान देने से, अंततः वे समाधिनिष्ठ मुक्त बनीं थीं।
बंगाल के ख्यातनाम संत रामकृष्ण परमहंस के जीवन का एक प्रसंग है। वे समाधिनिष्ठ थे, यही नहीं वे कई पात्र जीवों को भी समाधि करवाते थे। एक बार उनके भाँजे ह्रदय मुखोपाध्याय ने कहा: ‘मामा, आप कई लोगों को समाधि करवाते हो... मुझे भी अनुभव करना है!’ रामकृष्ण परमहंस ने इन्कार करते हुए कहा: ‘ह्रदु, तेरा मन अभी उस अनुभव के लिये तैयार नहीं है। अतः तुम समाधि का आग्रह न करो ।’ परंतु ह्रदयनाथ न माना। उसके दुराग्रह के कारण अंततः रामकृष्ण ने उसे समाधि करवाई। परंतु समाधि का अनुभव ह्रदयनाथ का मन सह न सका वह पागल हो गया। मन की योग्य अवस्था अर्थात् पात्रता के बिना ध्यान या समाधि का अनुभव हानिकारक साबित हो सकता है।
समाधि अवस्था का वर्णन करते हुए महर्षि पतंजलि योगसूत्र में कहते है; ‘तदा द्रष्टुः स्वरूपेङवस्थानम् ।’ तालाब के जल तरंग थम कर शांत होते ही हम तालाब का तलदेख सकते है। मन की स्थिति भी यही है। मन के शांत होते ही हम जान सकते है कि हमारा वास्तविक रूप क्या है, तब हम विषयों के साथ मिश्रित हुए बिना हमारे स्वरूप में स्थित रहते है।