१४. मुकाम चौदहवाँ : मन एवं स्वास्थ्य

स्वास्थ्य शब्द का सामान्य अर्थ यह होता है कि स्व यानि आत्मा में स्थित होना अर्थात् आत्मारूप से निज स्वस्वरूप के अस्तित्व का आनंद लेना। आत्मा परमात्मा का अंश होने से रोग, मोह, दैत्य, लोभ, कोप, ताप आदि विकारों से मुक्त है- निर्लेप है। अतः जब मन आत्मा परमात्मा में स्थित होता है तब वह शारीरिक निर्बलता और व्याधि विकारों से मुक्त होकर आनंदमय उच्च अवस्था को प्राप्त करता है, जिसे स्वास्थ्य कहते है।

स्वास्थ्य ही वास्तविक संपत्ति है एवं स्वास्थ्य ही परम सुख है। स्वास्थ्य के बिना सौंदर्य अल्पकालीन और निर्रथक है। सर्वांग संपूर्ण स्वास्थ्य ही मानव जीवन की स्वाभाविक और सहज अवस्था है। ‘धम्मपद’ नामक बौद्धधर्म के विख्यात ग्रंथ में भगवान बुद्ध ने भी स्वास्थ्य को ही ‘परम लाभ’ कहकर आरोग्य परमा लाभाः। वचन उच्चारे है। आयुर्वेद में लिखा है: ‘धर्मार्थकामामोक्षाणामारोगाग्यं मूलमुत्तमम्। अर्थात् धर्म, अर्थ, काम, और मोक्ष चतुर्विध पुरुषार्थ को प्राप्त करने का सर्वश्रेष्ठ एवं मुख्य साधन स्वास्थ्य ही है। तंदुरस्ती मनुष्य मात्र का जन्म सिध्ध् अधिकार है।स्वास्थ्य की उपेक्षा तो वास्तव में तो स्वयं के अस्तित्व की ही उपेक्षा है – जीवन सार्थकता की उपेक्षा है।

‘महाभारत में एक श्लोक है:

सत्त्वम् रजस्तम इति मानसाः,स्युः त्रयो गुणाः।

तेषां गुणानां साम्यं यत् तदाहुः स्वास्थ्यलक्षणम्॥

सत्त्व, रजस और तमस ये तीनों मन के गुण है। इन गुणां की साम्यवस्था को ही स्वास्थ्य कहते है। इस प्रकार वास्तविक स्वास्थ्य शरीर एवं मन दोनों के साम्य पर अवलंबित है। जब यह साम्य बिगड़ता है, तब प्रकृति ने शरीर को प्रदान की हुई नैसर्गिक प्रतिकारक शक्ति क्षीण होने लगती है और शरीर रोगों का घर बनता है। योग्य आहार-विहार, सात्त्विक विचार-सदाचार, सत्य, प्रेम जैसी निस्वार्थ भावना तथा कामक्रोधादि रजोगुणी दोष से मन को मलिन होने से बचाना - इन सब के सिवा नैसर्गिक स्वास्थ्य संभव ही नहीं है। आज हम मन की उपेक्षा कर शरीर को जिम्नेशियम में केवल शारीरिक कसरत द्वारा स्वस्थ रखने का निर्रथक प्रयास करते है। इसके मूल में स्वास्थ्य के बारे में वास्तविक समझ का अभाव है।

विलियम हार्वे नामक तबीब ने 300 वर्ष पहले कहा था कि ह्रदय (Heart) का मन के साथ सीधा संबंध है। सुख-दुःख, पीड़ा-शांति, आशा या भय इन सभी की सीधी असर ह्रदय पर होती है। उग्र स्वभाव के, अति महत्वकांक्षी, जल्दबाज़ी और किसी भी प्रकार से कार्य को पूरा करने वाले चिड़चिड़े स्वभाव के लोग ह्रदय रोग के भोग जल्द ही होते है। जिसे जीवन में स्वास्थ्य और शांति चाहिये उसे अंग्रजी का एक सूत्र याद करने जैसा है: If you want to take rest, forget the rest. फिकर को फाँक लो। एलेक्सील केरल कहते है: ‘बड़ी बात आपके जीवन में बरसों को जोड़ना नहीं, अपितु बरसों में जीवन जोड़ना है ।’ खिंचते हुए बरसबीताने में जीवन की सार्थकता नहीं है, परंतु जीवन के अंतिम पल तक पल-पल को जीवन को जीने से ही जीवन सार्थक होता है।

डॉ. फ्रीडमेन और डॉ.रॉझेन स्वयं के संशोधन के अंत में कहते है: ‘मनुष्य का निर्बल स्वभाव, अविरत टेन्शन, गैरजिम्मेदार रहन-सहन, अविरत धूम्रपान तथा शराब का सेवन ये सभी बातें ह्रदयरोग और डायाबिटिस जैसे दर्द के लिये जिम्मेदार है। इससे उलटा आनंदी स्वभाव वाले संतोषी एवं निर्व्यसनी लोगों को ऐसे राजरोग नहीं होते है ।’ हार्वर्ड मेडिकल समूह के प्रोफेसर डॉ.हर्बर्ट बेन्सन .स्वयं के ‘The relaxation response & the mind body effect’ पुस्तक में लिखते है: ‘मानसिक तनाव और खिंचाव मानवी के महत्व के अंगो पर बहुत खराब असर करते है। जीवन के विपरित संयोग में भी अगर भय और टेन्शन के स्थान पर हिंमत, आशा और धीरज जैसे सकारात्मक अभिगम अपनाया जाए तो स्वास्थ्य के बारे में कई अच्छे परिणाम देखे जा सकते है।

केवल ह्रदयरोग के लिये ही नहीं, किसी भी गंभीर दर्द के लिये मानसिक शक्ति अति महत्व की है। एलोपेथी में अब तक जंतुओं (Germs) द्वारा ही अधिकत्तम रोग होते है, यह माना जाता था, परंतु अब रोग होने में तथा स्वस्थ होने में मानसिक कारण को ही महत्वपूर्ण गिना जाता है। युनिवर्सिटी ऑफ रोचेस्टर की मेडिकल कॉलेज के प्रोफेसर डॉ.लग्नार्ड फोक्स ‘सायकॉन्युरो इम्युनोलोजी’ पुस्तक में लिखते है: ‘किसी व्यक्ति को केन्सर हो या रुमेटोइड आर्थराइटिस हो तब उस रोग के मूल में दर्दी का मानसिक अभिगम ही जिम्मेदार होता है। मनुष्य की रोग प्रतिकारक शक्ति उसकी मानसिक शक्ति के अनुसार होती है। मन को एकाग्र करने से शरीर और दिमाग में उल्लेखनीय बायोकेमिकल परिवर्तन होते है। जो शरीर की प्रतिकारक शक्ति को बेहिसाब बढ़ा देते है ।’

अलग-अलग रोग के नाम हमने ही रखें है। हकीकत में कुछ रोग या कुछ तकलीफ ऐसे वर्गीकरण की कोई आवश्यकता है ही नहीं। जब शरीर और मन की संवादिता (Harmony) गड़बड़ा जाती है, तब ही तकलीफ या रोग की शुरुआत होती है। अतिशय टेन्शन पेट के अल्सर को आमंत्रण देता है। विचारों में विरोधाभास चमड़ी के रोग के लिये जिम्मेदार है। मन का नकारात्मक अभिगम लॉ बी.पी. से लेकर ह्रदय रोग तक के रोग के लिये जिम्मेदार है। गेलन जैसे एलोपेथी के पितामह ने कहा है कि स्त्रियों के स्तन केन्सर का कारण उनका गमगीन स्वभाव है। हाँलाकि पुरुषों की अपेक्षा स्त्री अधिक आयुष्यमान होती है क्योंकि स्त्रियों के हॉर्मोन्स एस्ट्रोजन तत्त्वों से भरपूर होने से वे पुरुषों की अपेक्षा मानसिक रूप से अधिक सक्षम होती है।

पश्चिम के डॉक्टर भी अब हमारे आयुर्वेद में जो मूलभूत बातें लिखी है, उनको परोक्ष रूप से मानने लगे है। आयुर्वेद स्वास्थ के लिये मूलतः दो तत्त्वों को मुख्य मानता है। जिसमें प्रथम जठराग्नि है। जठराग्नि यानि भगवान वैश्वानर स्वरूप परमात्मा तत्त्व, गीता में श्रीकृष्ण भगवान ने प्राणीमात्र में वैश्वानर अग्नि रूप से स्वयं विद्यमान है, यह कहा है। इस अग्नि का जो जतन कर सके- उसे मंद न होने दे वही स्वास्थ का जतन कर सकता है! शरीर का दूसरा भाग्य विधाता वायु है। वायु तंत्रयंत्रधरः। वायु ही जीवन है – जीवनाधार है – प्राण है। आयुर्वेद के अनुसार मन वायु है और वायु मन है। हमारी सभी मानसिक क्रियाओं को करने वाला वायु ही है। जठराग्नि और वायु ये दोनों ही शरीर की नियामक शक्ति है। अतः हमारे स्वास्थ्य का आधार इन दो तत्त्व पर ही है।

आयुर्वेद के महान आचार्य वाग्भट ‘अष्टांग ह्रदय’ में लिखते है: ‘जिसके शरीर की चेष्टा, वाणी और मनगाय जैसी सरलता का अनुसरण करते है तथा जो जैसाबोले या सोचे वैसा ही करता है ऐसे गुणवान मनुष्यों के आयुष्य, इंद्रिय, और शील स्थिर होते है ।’ आयुर्वेद के मतानुसार मन और इंद्रियों में विकृति न हो तथा वे स्वयं के स्वाभाविक स्वरूप में रहे, अतएव बुद्धिमान व्यक्ति कोसदैव संयोग का पालन कर अतियोग, आयोग, मिथ्यायोग का त्याग कर देश, काल, एवं निज प्रकृति से विपरित वस्तु का सेवन न करना चाहिये। उदाहरण स्वरूप वात प्रकृति वाले मनुष्य को गरम प्रदेश में हटाने से या गरम (अधिकतापमान वाले) वातावरण में रखकर वातल आहार-विहार से बचाना चाहिये। मनुष्य को स्वयं की प्रकृति के अनुसार दिनचर्या, ऋ तुचर्या तथा रात्रिचर्या का आयोजन कर स्वयं को हितकर-अहितकर आहार का योग्य विचार कर स्वयं के मन और इंद्रिय को स्वस्थ अवस्था में रखना चाहिये। जो मनुष्य स्वास्थ्य प्राप्त कर सकता है, वही मनुष्य मनोनिग्रह कर ध्यान द्वारा परमात्मा की असीम कृपा का अधिकारी होता है।