४. मुकाम चतुर्थ : मन का आधार
छांदोग्य उपनिषद में एक सुंदर आख्यायिका आती है। महर्षि उद्दालक का पुत्र श्वेतकेतु बारह साल का होता है, तब महर्षि उसे विद्याप्राप्ति के लिये गुरु गृह भेजते है। श्वेतकेतु बारह साल तक गुरुगृह रह कर वेदादि सर्व शास्त्रों में निष्णात होकर पिता के पास लौटता है। वेदशास्त्रों में निष्णात होने के कारण श्वेतकेतु को विद्या का गर्व होता है। अहंकार के कारण इतराने लगता है, पिता के पास आकर कहता है, ‘पिताश्री, मैं सर्व वेदों में निष्णात होकर आया हुँ। आप जो कहे सुना सकता हुँ ।’ महाज्ञानी उद्दालक पलभर में जान जाते है कि पुत्र को अभी पूर्ण ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ है, अधुरापन होने की वजह से गर्जना करता है। थोड़ी समझदारी की कमी है उसे पूर्ण करनी ही होगी। महर्षि कहते है, ‘बेटा, तुम पंद्रह दिनो तक कुछ न खाना, प्यास लगने पर पानी पिना। पंद्रह दिनों के बाद मेरे पास आना तब मैं वेदों के बारे में पुछूँगा ।’ श्वेतकेतु ने कहा ‘अच्छा पिताश्री ......’
श्वेतकेतु ने उपवास आरंभ किये एक दिन ........दो दिन ......इस प्रकार एक सप्ताह बीत गया। उसके शरीर में कमजोरी लगने लगी। मन सुस्त रहने लगा। भुखे पेट से शांति से नींद भी नहीं आती थी। स्मृति धुँधली होने लगी। चिंतन विलीन होने लगा। कृष्ण पक्ष के चँद्र की सदृश धीरे-धीरे मन की शक्ति क्षीण होने लगी। सोलहवें दिन पिता की समक्ष जा कर उसने पूछा, ‘तात, क्या सुनाउँ?’ महर्षि ने पुत्र के मुख की ओर देखते हुए कहा: ‘वत्स, ऋक् यजुर और सामवेद की ऋचा सुनाओ ।’ श्वेतकेतु ने याद शक्ति को टटोला, परंतु अफसोस .......कुछ याद नहीं आया। अथक प्रयत्न किये परंतु मिथ्या! उसका अहंकार बर्फ की सदृश पिघल गया, पश्चाताप के आँसुओं से आँखे भर आई। ऋ षि की गोद में सर रखकर वह रो पड़ा। ‘प्रभु, मुझे कुछ याद नहीं आ रहा है, कहाँ गया मेरा ज्ञान?’ महर्षि की तेजस्वी आँखे भी हर्षाश्रु से भीग गई। पुत्र को समझाते हुए उद्दालक बोले: ‘हे सोम्य! उपवास करने से अन्न के बिना मन की शक्ति क्षीण हो जाती है। बेटा, एक बात समजो, महाभयंकर अग्नि बुझ गया हो और उसकी एक चिनगारी शेष बची हो वह बड़ी चीज को जला नहीं सकती है। उसी प्रकार उपवास करने से तेरे मन की स्मरण शक्ति क्षीण होकर नाममात्र बची है। उसके द्वारा तुम ऋ चा जैसी मुश्किल बात याद नहीं कर सकते। वत्स! अब पहले तुम खा लो पश्चात ही तुम मेरी बात समझ सकोगे ।’ श्वेतकेतु सोलहवें दिन भोजन करता है। उदर में अन्न जाने से मन प्रफुल्लित होता है।
भोजन के पश्चात महर्षि के पूछने पर वह सब कुछ सुनाता है। श्वेतकेतु को भी आश्चर्य होता है उद्दालक उसे समझाते हुए कहता है: ‘वत्स! अभी मैने तुम्हें बताया उसके अनुसार महाभयंकर अग्नि बुझने के पश्चात शेष बची चिनगारी पर सूखी हुई घास डालने से वह तुरंत ही जलने लगती है और धीरे-धीरे आग का स्वरूप ले लेती है। उसी प्रकार तेरे मन की शक्ति के सोलह भाग में से बचा एक भाग अन्नरूप सूखी घास मिलने से प्रज्वलित हो उठी, अतः अब तुम वेदों की ऋ चा को याद कर सकते हो। हे सोम्य! अन्नमयं हि मनः। मन अन्नमय है ।’ कुछ रुकने के पश्चात महर्षि कहते है: ‘पुत्र भोजन के पश्चात जठराग्नि द्वारा पचाये गये अन्न के तीन भाग हो जाते है। तीन भागों में विभक्त अन्न का जो अत्यंत स्थूल अंश है, वह मल रूप में बड़ी आँत में चला जाता है, जो मध्यम अंश है वह रसादि क्रम से अग्रसर होकर अंततः माँस में रूपांतरित होता है, जो अत्यंत सूक्ष्म अंश है वह ऊर्ध्व दिशामें गति कर हृदय में पहुँच कर हिता नामक सूक्ष्म नाड़ी में प्रवेश कर मन स्वरूप में परिवर्तित होता है ।’ इस प्रकार इस आख्यायिका द्वारा सहज ही समझ में आता है कि मन अन्नमय है, मन का मुख्य आधार आहार है। फलतः कहावत है ‘जैसा अन्न वैसा मन’ अति गहन चिंतन के पश्चात यह बात भली भाँति समज में आती है कि हमारी प्रत्येक इन्द्रिय के आहार की सूक्ष्म असर हमारे मन पर अवश्य ही होती है।
हम जो भोजन ग्रहण करते है वह किस प्रकार की खाद्यसामग्री से, किस के हाथों से कितनी शूचिता से बना है यह अत्यंत महत्व का है। आप भोजन ग्रहण करते है उससे पूर्व उस पर कितनों की दृष्टि पड़ी है, यह भी अन्न की मनोगामी असर पर असर करता है। इसीलिये भोजन ग्रहण करने से पहले भगवान को भोग लगा कर प्रभु के प्रसाद के रूप में ग्रहण करने से अन्न पर की संभवित नकारात्मक असर को टाल सकते है। स्वामी विवेकानंद ‘राजयोग’ में लिखते है: ‘आहार के बारे में कुछ नियम आवश्यक है; मन को शुद्धातिशुद्ध बनाये ऐसा आहार लेना चाहिये। अगर आप प्राणी संग्रहालय में जाए तो इसका उदाहरण तुरंत ही दृष्टिगोचर होगा। हाथी बड़ा प्राणी होने के बावजुद शुद्ध शाकाहारी होने की वजह से शांत एवं नरम स्वभाव का है, जबकि शेर-बाघ मांसाहारी होने की वजह से क्रूर एवं अशांत(Restless) प्रतीत होते है।
दो व्यक्ति एक साथ एक ही समय में एक जैसा ही भोजन करते हुए भी भोजन की असर उन दोनों के मन पर भिन्न-भिन्न प्रकार की होती है, क्योंकि इसका कारण भोजन करते समय मन की स्थिति एवं भाव है, उसका भी महत्वपूर्ण भाग है। मीराबाई ने राणा का भेजा हुआ ज़हर भी प्रभु का चरणामृत मानकर पिया तो ज़हर भी अमृत समान जीवनदायी बन गया था।
एक बार भगवान बुद्ध लुंबिवन में एक वृक्ष के नीचे बैठे थे। पास के नगर में से तथागत के दर्शन को आये एक श्रेष्ठी ने प्रभु से प्रश्न पुछा: ‘भगवन्, सत्य क्या है?’ भगवान ने प्रसन्नता से कहा: ‘आपका मन ही सत् है, चित्त आनंद है अगर आप समझे तो!!’ भगवान ने पिछले विधान पर अधिक जोर दिया –’अगर आप समझे तो!’ मन को अगर हम समझ सके तो ही उसके उस पार स्थित सच्चिदानंद रूप आत्मा की अनुभूति सहज हो जाती है।