११. मुकाम ग्यारहवाँ : मन एवं विचार
मन के बारे में लंबी तात्त्विक चर्चा तो शायद हम कर लें, परंतु क्या वास्तव में मन को जानते है?क्या मन कभी मन के रूप में हमें प्रत्यक्ष होता है? इसके बारे में रमण महर्षि कहते है: ‘हमारा या किसी का मन इंद्रिय प्रत्यक्षता का विषय नहीं है। एक अर्थ में यह अनुमान का विषय है, क्योंकि हम मन को उसकी प्रवृत्ति के द्वारा ही जानते है। यह प्रवृत्ति यानि मुख्यतः विचार। अगर सभी विचारों को निकाल कर मन को ढूंढने जाए तो मन जैसी कोई वस्तु दिखाई नहीं देती है। इस प्रकार विचार मन का अभिव्यक्त स्वरूप है। विचारों को अगर ज्ञेय स्थान पर रखा जाए तो उसका भी विचारक होना चाहिये। यह विचारक अहम् है। अहम् मूल विचारक है। जिसमें से मन रूप विचार उद्भवित होते है। सांख्य दर्शनानुसार उत्क्रांति के क्रम में महतत्त्व में से अहम् और अहम् में से ही मन का उद्भव का क्रम दर्शित किया है।
इन विचारों को आधार रूप माना हुआ मन, उसके मूल स्वरूप में चेतना या सभानता ही है। जब उस पर अहम् का वर्चस्व स्थापित होता है, तब तर्क बुद्धि, सोच तथा ज्ञानेन्द्रिय की शक्ति रूप से क्रियाशील बनती है। इस प्रकार अहम् से मन परिमित होता है। इससे पूर्व वह अपरिमित चेतना के साथ एकरूप होता है। इसीलिये रमण महर्षि कहते है: ‘मन आत्म स्वरूप में स्थित अजोड़ शक्ति है, क्योंकि वह सर्व वृत्तियों को पैदा करता है ।’
अब अगर हम वैज्ञानिक दृष्टि से विचार करें तो, विचार वास्तव में क्या है? विचार चित्त में उत्पन्न होने वाले आंदोलन है। जब हमारे चित्त में स्मृति द्वारा योग्य क्षमता आती है, तब बाहरी वातावरण की उत्तेजना से चित्तमें विचार के आंदोलन आते है। ज्ञान, स्मृति, विशेषता एवं स्वभाव का प्रतिघोष ही विचार है। विचार से परे चेतना है, जो कुछ कर सकती है। विचार से परे उस चेतना के पास पहुँचने का सबसे सरल मार्ग है विचार का निरीक्षण करना, अविरत स्वस्मरण रखना, घटना जैसी होती है वैसे ही उसे स्वीकार करना। उसमें प्रतिक्रिया या पसंद-नापसंद रखनी नहीं है। इस प्रकार अविरत निरीक्षण करते-करते अचानक निरीक्षण से परे जा सकेंगे। एक सहज स्थिति का निर्माण होगा। जिसमें विचार की नहीं, अपितु चेतना की अनुभुति होगी। हमारी आसपास जो चेतना का सागर लहराता है।उसे वैज्ञानिक ईथर कहते है। हमारे विचारों की तरंग इस चेतना को आवरित कर एक स्वरूप खड़ा करती है। उसे विचार का स्वरूप अथवा विचार की मूर्ति कहते है।
कभी कोई अनचाही व्यक्ति की ओर धिक्कार का भाव या निंदा का भाव उद्भवित हो तब उसके विचार स्वरूप क्षणमात्र में उस व्यक्ति के पास पहुँच जाते है। वे विचारस्वरूप उस व्यक्ति के मन में भी हमारे लिये वैसे ही विचार उत्पन्न करता है। कभी अगर कोई व्यक्ति उच्च विचार या भाव के प्रभाव में हो तो हमारे धिक्कार के विचारस्वरूप दुगनी गति से लौटकर हमारे मन पर आघात करते है। परिणाम स्वरूप हम निर्बलता का अनुभव करते है। इसीलिये हमारे वेद कहते है कि सभी का भला चाहे, कभी किसी का बुरा हो ऐसा संकल्प न करें। सभी का भला चाहने वाले का भला ही होता है। सर्वे सुखिनो सन्तु, सर्वे सन्तु निरामयाः। इस प्रार्थना में स्वकल्याण का गर्भित उद्देश्य ही छिपा है।
कई बार हम किसी को याद करते हो और वह आ पहुँचता है। हम उसको सहज ही कहते है, ‘आपकी आयुष्य लंबी है,आपको याद करते थे और आप आ गये! हकीकत में उसके प्रबल विचारतंत्र एवं विचार स्वरूप ने ही हमें उसके विचार के लिये प्रेरित किया होता है। जिसकी चेतना जितनी जीवंत, उसके विचार स्वरूप भी उतने ही प्राणवान होते है और ऐसी व्यक्ति वास्तव में अधिक जीती है। विचारस्वरूप का संकल्पशक्ति का प्रभाव कैसा प्रबल एवं आश्चर्य कारक होता है इसका जीता जागता उदाहरण राजकोट में भूपेन्द्र रोड़ पर स्थित श्री स्वामिनारायण मंदिर में आज भी देख सकते है। आज से करीब दो सौ साल पहले इस स्थान पर एक कंटीली बैरी थी। मुंबई के गवर्नर लॉर्ड माल्कमसाहब को मिलने भगवान श्री स्वामिनारायण गढपुर से राजकोट पधारे तब उस पेड़ के नीचे संत मंडल की सभा कर बैठे थे राजकोट से विदा के समय संत शिरोमणि स. गु. गोपाळानंद स्वामी का उपवस्त्र बैरी के काँटे में फँस जाने से स्वामी हँसकर बोले: ‘रे पगली, भगवान पुरुषोत्तमनारायण तेरे नीचे बिराजे तथापि तेरा कंटीला स्वभाव न गया?’ उसके पश्चात आशचर्य कारक यह घटना घटित हुई कि उस बैरी के सारे काँटे ज़ड़ गये! आज भी वह बैरी राजकोट के स्वामिनारायण मंदिर के प्रांगण में खड़ी है।
हमारे विचार एवं वाणी कभी भी मरते नहीं है। वे सदैव अवकाश में स्थित चेतना (इथर) में अंकित रहते है। विचार कैसी प्रबल शक्ति है, ज्ञात होने के पश्चात इसका दुरुपयोग नहीं कर सकते है। विचार एक ऐसी छूरी है जिसके द्वारा हम सब्जी काटने जैसा रचनात्मक कार्य भी कर सकते है और खून करने जैसा निषेधात्मक कृत्य भी कर सकते है। विचारस्वरूपों की विशाल माया जाल हमारी ही बुनी हुई है। इसका कैसा उपयोग करें यह हमारे ही हाथ में है। इसीलिये एक कवि ने कहा है कि,
‘जिंदगी है जाम, इसे छलका, है तेर हाथ में,
तोड़ना या तैरना, यह नाँव तेरे हाथ में ।’