८. मुकाम आठवाँ : वैश्विक चेतना और मन

समुद्र की छोटी बड़ी लहरें समुद्र के समग्र अस्तित्व के एक भाग रूप होती है। उसी प्रकार संसार की प्रत्येक व्यक्ति का मन विश्व मन की छोटी-बड़ी लहरें सदृश है। हमारा मन उस विराट मन का ही अंश है। जिस प्रकार सागर की एक लहर दूसरी लहर के साथ जूड़ी रहती है, उसी प्रकार संसार की प्रत्येक व्यक्ति निज मन के द्वारा एक दूसरे के साथ जूड़ी रहती है। मन का तत्त्व प्रत्येक मनुष्य में समान है। जिस प्रकार सूर्य एक होते हुए उसके प्रतिबिंब अनेक है, उसी प्रकार विश्व मन के प्रतिबिंब को ही हम हमारा मन मानते है।

मन सर्वत्र निर्विकारी है, बाहर से आते हर विचार को वह छोड़ देता है, परंतु बुद्धि बार-बार प्रेरणा देकर मन को हिला देती है। हमारे संयोग, घटना, आसपास का वातावरण ये सभी उस प्रतिबिंब को धूमिल कर देते है। इस बात को अधिक स्पष्टरूप से समझाते हुए पू. विमला ठाकर कहतीं है: ‘विश्व चेतना के हम सब विभाग है। वैश्विक मन सभी का एक ही है, मन से हम सभी अविभाज्य रूप से जूड़े है। वैश्विक चेतना सभी में एक ही होते हुए, हम में स्थित उस चेतना के अंश का तैतीसवें हिस्से जितना अहंकार, हम मं ‘मैं और मेरा’ ऐसा द्वैत उत्पन्न कर क्लेश पैदा करता है। इस अहंकार तले सभी एक है ।’ अगर अहंकार पिघल जाए तो प्रभु प्राप्ति जल्द ही हो जाए! सर्व में एक ईश्वर विद्यमान है। स्वयं की तरह ही सभी को दृष्टिकृत करें, जो स्वयं को पसंद न हो वह कार्य अन्य के लिये न करें। इस प्रकार की समझ तथा इसके परिणाम से जीवन में आता सदाचार हमारे मन को अहंकार से परे ले जाता है।

शरीर एवं मन को शिथिल जागृत मन को तर्कहीन करें तो हम तुरंत ही विश्वचेतना के साथ जुड़ जाते है। हमारे जागृत मन के कुछ नीचे ही वैश्विक चेतना का महासागर गर्जना कर रहा है। रात्रि को निंद्रा के दौरान स्वप्न में हमारी चेतना विश्वचेतना से अधिक करीब होने के कारण स्वप्न द्वारा हमें अवश्य भविष्य दर्शन होता है। विचार संक्रमण की घटना (Mental telepathy) के पीछे भी यही रहस्य छूपा है। अमेरिका में हेरोल्ड शर्मन नामक मनोवैज्ञानिक ने Extra sensory perception (ESP) के बारे में गहन संशोधन कर अजोड़ सिद्धि हाँसिल की है।

अमेरिका में सन 1965 के मई की 16 तारीख को चार पेसेन्जर के साथ सिडनी गर्बर का प्लेन गुम हुआ। वॉशिंगटन में उसने आखिरी मेसेज दिया, उस समय वह वेन्टाशी सरोवर के ईलाके में तूफान का सामना कर रहा था। तत्पश्चात उसकी कोई खबर न मिलने से हेरोल्डशर्मन की भतीजी जेनीफर ने अपने मित्र सिडनी की तलाश करने शर्मन से विनंती की। शर्मन ने सिडनी के हस्ताक्षर पर ध्यान केन्द्रित कर वैश्विक चेतना के साथ संपर्क कर ढूँढ निकाला कि वेन्टासी सरेावर से 40 मील दूरी पर 4500 फीट की ऊचाई पर सिडनी का प्लेन पर्वत से टकरा कर टूट पड़ा था। घटना स्थल की तलाश करने में चार महिने लगे, परंतु शर्मन ने बताया था उसी स्थान से चार व्यक्ति के अस्थि तथा प्लेन का भँगार मिला। शर्मन की तलाश सही होने से अमेरिका में हाहाकार हो गया। अमेरिकन मन की अधिक शक्ति जानने के लिये उत्सुक हुए। लोंगो के मन में अनेक सवाल उठने लगे: क्या विश्व के समग्र वातावरण के साथ हमारा मन तादात्म्य स्थापित कर सकता है? क्या दुनिया में होने वाली सभी घटनाएँ वातावरण में अपनी छाप अंकित करती होंगी? इस विषय में जो आधुनिक संशोधन हुआ, वह हमारे पुराणों की कपोल कल्पित लगने वाली कई कथाओं को बिलकुल सच साबित करता है।

हमारा शरीर यानि पिंड एवं जगत यानि ब्रह्मांड, इन दोनों में एकता है। या पिंडे सा ब्रह्मांडे। हमारे मन की वैश्विक चेतना के साथ एकता होने से सारा जगत हस्तामलवत् देख सकते है, सुन सकते है और जान सकते है। पश्चात विश्व का कोई भाग अनजान नहीं रहता है। विश्व की कोई घटना अनजानी नहीं रहती है! हमारे संत तथा सिध्ध् मुक्तों के लिये यह प्राप्ति अत्यंत सहज थी। एक बार सद्गुरु स्वामी श्री वृंदावनदासजी को एक नवयुवान मुक्त ने पूछा: ‘स्वामी, आप दीवाल के आरपार देख सकते है?’ स्वामी ने नम्र भाव से कहा: ‘भगवान की कृपा से यहाँ बैठे दीवार की आरपार ही नहीं ब्रह्मांड के आरपार भी देख सकता हूँ। ब्रह्मांड में कहाँ क्या हो रहा है, हो चुका है एवं होने वाला है, मैं जो देखना चाहुँ तो देख सकता हूँ ।’ सिध्ध् मुक्तों के लिये यह सहज स्वाभाविक है, परंतु मुमुक्षु जब परमात्मा की प्रसन्नता के साधन के रूप में ध्यान-भजन-स्मरण करता है, तब परमात्मा की प्रसन्नता रूप ध्येय प्राप्ति से पूर्व प्रलोभन रूप ऐसी अनेक सिद्धियाँ उसके मार्ग में आती है। उसकी ओर सदंतर दुर्लक्ष कर अग्रसर हो तो ही प्रभु प्राप्ति संभवित होती है।