आमुख
भगवान श्री स्वामिनारायण की अनंत दिव्य लीला एवं सर्वजीवहितावह सामाजिक एवं आध्यात्मिक प्रवृत्तियाँ हमें उच्च प्रकार की मानवता, सेवा, समाजसुधार तथा प्रेमभक्ति के गुणों का सिंचन करनेवाली तथा नास्तिकता के गाढ तिमिर को भेद परब्रह्म परमात्मा के प्रकाश को प्राप्त कराए ऐसी चमत्कारी एवं समर्थ हैं। उसका अविरत मनन-चिंतन हमारा पूर्णरूप से परिवर्तन कर हमें संस्कारी, सदाचारी तथा वास्तविकरूप से सत्संगी बनाएगा यह निर्विवाद है। इस उद्देश्य को लक्ष्य में रख, अ. मु. नारायणभाई ठक्कर ने यह पुस्तिका तैयार की है।
अंधश्रद्धा, कुरितियाँ, प्रलोभन, वहम एवं धर्म में प्रवेशित गलतफहमी से समाज का वातावरण जब दूषित तथा कलुषित हो रहा था, तब क्रांतिकारी अवतारी महाप्रभु श्री स्वामिनारायण ने मनुष्य स्वरूप में प्रकट हो, जीवों को अज्ञानरूपी अंधकार से बाहर निकाल प्रकाश में लाए। मनुष्यों में भले-बुरे तथा सही-गलत के विवेक को समझने की दृष्टि पैदा की। यह कार्य उन्होंने अनेक लोगों के जीवन के साथ एकरूप होकर किया। लोगों ने सदाचार को समझा; धर्म, ज्ञान, वैराग्य तथा भक्ति के मूल्यों को समझा तथा अपने वर्तन में सम्मिलीतकर सच्चे मानव बने।
वर्तमान समय में श्री स्वामिनारायण महाप्रभु के समन्वयकारी, सर्वमान्य धर्म की स्वच्छ तथा उन्नत नीतिरीति की पावनकारी ज्योत विश्वभर में प्रकाशित हो रही है। सर्वत्र स्वामिनारायण भगवान का दिव्य संदेश मानवजाती की आत्मा को झँझोडकर जाग्रत कर रहा है।
भगवान श्री स्वामिनारायण के जीवन-कथन का तात्विकरूप से अध्ययन करना यह आध्यात्मिक पिपासु प्रत्येक व्यक्ति के लिये आवश्यक तथा अनिवार्य है। प्रत्येक व्यक्ति ऐसा करने को प्रेरित हो अतः संक्षिप्त में स्वामिनारायण भगवान के जीवन के भिन्न-भिन्न सामाजिक तथा आध्यात्मिक पहलूओं को उजागरकर उनके अवतारी कार्य को अनेकविध दृष्टि से इस पुस्तिका में प्रस्तुत किया है। यह पुस्तिका इस दिशा में सर्व को उपयोगी तथा फलदायी हो ऐसी महाप्रभु को प्रार्थना।
सं. 2063, महा वद चौदश
ई. स. 2007, 16 फरवरी
प्रकाशन समिति
श्री स्वामिनारायण डिवाइन मिशन अमदावाद