१८. संघर्ष-विवाद का त्याग

नारायण तथा शिवजी दोनों की वेद में एकात्मता प्रतिपादित की है, य बताकर उन्होंने शैव तथा वैष्णव के बीच चलते संघर्ष को मिटाया। उन्होंने ज्ञानमार्ग तथा कर्मयोग के मध्य समन्वय करके दोनों का आश्रय रखने को कहा। केवल धर्म या केवल ज्ञान या केवल वैराग्य ही आत्मस्वरूप की प्राप्ति में साधनभूत नहीं है, किंतु इन तीनों का यदि भक्ति के साथ समन्वय हो तो ही अहंममत्व के भाव टलते हैं तथा परमात्मा के स्वरूप का साक्षात्कार होता है, इस सत्य की यथार्थता को स्वयं के जीवन द्वारा दृष्टिकृत करवाकर उन्होंने ज्ञान के विवाद मात्र को टाल दिया।