२६. स्वामिनारायण धर्म की विशिष्टताएँ
(1) इस धर्म के अनुयायी वर्ग में अनेक वर्ण, वर्ग तथा धर्म के लोग समाविष्ट हुए हैं। कोई भी व्यक्ति जात-पात या अन्य किसी प्रकार के भेदभाव बिना इस धर्म में प्रवेश कर सकते हैं। उन सभी मनुष्यों को समदृष्टि से अपनाया जाता है।
(2) इस धर्म में प्रवेश करनेवालों को ‘दारू, मांस, चोरी, व्यभिचार तथा दुषित न होना तथा न करना’ ये पाँच नियम आंतर-बाह्य शुद्धि के लिए स्वीकारना अनिवार्य है।
(3) स्वामिनारायण ने धार्मिक इमारत की नींव सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य तथा साकार परब्रह्म की उपासना के चार सिद्धांतों पर रची है।
(4) स्वामिनारायण ने परमात्मा के स्वरूप का यथार्थ निर्णय सांख्य, योग, वेदांत तथा पंचरात्र इन चार शास्त्रों का समन्वयकर किया है।
(5) इस धर्म में प्रचलित वादों में से, द्वैतवाद से ज्ञान तथा महिमा युक्त भक्ति; अद्वैतवाद से साधनचतुष्टय तथा जीवन मुक्ति; शुद्धाद्वैत से सेवारीति तथा विशिष्टद्वैत से शरीर-शरीरी संबंधसिद्धांत तथा शरणागति उनके योग्य स्वरूप में ग्रहण किये गये हैं।
(6) प्राचीनकाल से हमारे यहाँ जो सर्व धार्मिक तथा नैतिक सर्वोच्च परंपराए चली आई हैं वे सभी इस धर्म में उनके शुद्धतम स्वरूप में दृष्टिगोचर होती हैं। इतना ही नहीं, परंतु विश्व के तमाम धर्मो के उत्तम तत्त्वों का इसमें समावेश किया गया है।
(7) यह धर्म केवल आध्यात्मिक मुद्दे तक सीमित नहीं; अपितु भौतिक को भी सम्मिलित करनेवाला शुद्ध व्यवहार धर्म है तथा यह केवल सुखी, शिक्षित तथा उच्च वर्ण तक मर्यादित नहीं है, परंतु निम्नांत तक के बहुजन समाज को स्पर्शनेवाला व्यापक धर्म है।
(8) यह धर्म त्याग, ज्ञान तथा तपश्चर्या से उज्ज्वलित हो उठता है; उसके साधु तथा हरिभक्त सदाचार शुद्धि का एक अलग ही प्रभाव डालते हैं। उनमें विशुद्ध वातावरण, ब्रह्मचर्य का निर्विकारी भाव, सेवा, सदाव्रत तथा संयम के आदर्श एवं ज्ञान, वैराग्य एवं प्रेमभक्ति की शीतलता की अनुभूति होती है। उनमें जो कोई विधिविधान, आचार एवं तत्त्वबोध विद्यमान हैं वे संपूर्ण सत्य एवं मुक्ति देनेवाले हैं।
(9) इस धर्म का प्रसार देशभर में तथा विदेश में बहुत ही बढा है एवं बढ रहा है, जो उसकी सर्वदेशीयता को दर्शित करता है।
(10) यह एसा मार्ग है जो हजारों वर्ष बाद भी तत्कालीन देशकाल के अनुकूल रहेगा।
इस प्रकार श्री स्वामिनारायण ने सर्वग्राही, सर्वोच्च एवं कल्याणकारी विश्वधर्म की स्थापना करने में अप्रतिम व्यवहारिक बुद्धि एवं समन्वयात्मक दृष्टि दिखाई है। यही स्वामिनारायण की वास्तविक महानता है।