२८. अब विदेशी महानुभाव श्री स्वामिनारायण के अवतारी कार्य का मूल्यांकन करते हुए क्या कहते हैं वह देखें

1. मि. हेन्री ज्योर्ज बर्जेस का स्वानुभव :

‘सहजानंदस्वामी कल्याणकारी कर्मवीर थे। उन्होंने किसी भी सत्तावान या श्रीमंत की सहायता लिये बिना ही हजारों लोगों को गलत राह से मोडकर सही राह दिखाई। सहजानंदजी, राजा से लेकर रंक तथा विद्वानों से लेकर अशिक्षित लोग, सभी में एक समान पूजनीय थे। उनकी नम्रता विरोधियों के हृदय के जहर को भी निचोड लेती थी।’

2. मि. बाउल्स लिखते हैं कि :

‘इस धर्म में जो साधु बनते हैं उन्हें आदेश दिया गया है कि चाहे कितना ही दमन या संत्रास दिया जाए तो भी बचाव किये बिना उसे सहन करना तथा संत्रास देनेवाले के प्रति मन में जरा भी रोष न रखना। वाकई इस धर्म की यह लाक्षणिकता है। उनके उपदेश की असर से नीति का स्तर बहुत उँचा उठा है।’

3. कलेक्टर विलियम्स स्वयं का अनुभव इस प्रकार लिखते हैं :

‘शास्त्रों में जिस स्तर की नीतिमत्ता का वर्णन किया है उसके मुकाबले सहजानंद की नीतिमत्ता बहुत उँचे स्तर की जान पडती है। वे उच्च प्रकार की पवित्रता तथा शुद्धि का उपदेश देते हैं। उन्होंने अपने शिष्यों को राह चलती स्त्रियों के प्रति दृष्टिपात भी न करने का आदेश दिया है। वे एकेश्वर का उपदेश देते हैं। जिन गाँव तथा प्रदेश ने सहजानंद का सत्कार किया है वे सब एक समय के सबसे खराब एवं खतरनाक गिने जाते थे। आज उनकी सबसे अच्छे एवं सलामत विस्तारों में गणना होती है।’

4. प्रिन्स होपकिन्स, प्रोफे., लंडन युनिवर्सिटी, स्वयं का स्वानुभव कहते हैं :

‘स्वामिनारायण में स्वयंभू शक्ति विद्यमान थी। स्वयं अवतारी पुरुष होते हुए भी कभी प्रतिष्ठित बनकर नहीं विचरे। स्वयं का जीवन कठोर संन्यासी के धर्मानुसार व्यतीत करते हुए भी उनमें प्रसन्नता, आनंद एवं विनोद की फूहारें बहती रहती थी। स्वयं गाते; स्वयं कुस्ती, मजाक मस्ती भी करते थे। ऐसे अद्भुत व्यक्ति उनके देहविलय के पश्चात् भी लुप्त नहीं हुए तथा अनेकों को अंतिम समय दर्शन देते रहे हैं।’

इस प्रकार देशविदेश के गहन अभ्यासी एवं आदरणीय महापुरुषों ने श्री स्वामिनारायण का तथा उनके द्वारा स्थापित धर्म का जो ऐतिहासिक मूल्यांकन किया है उस पर से प्रतीत होता है कि स्वामिनारायण वाकई अवतारी पुरुष थे।