२. श्री स्वामिनारायण का प्रादुर्भाव

यदा-यदा धर्म की ग्लानि होती है, तदा-तदा हरेक युग में परमात्मा अधर्म के विनाशार्थ एवं धर्म की स्थापना के लिये अवतार धारण करते हैं। श्री स्वामिनारायण के प्रादुर्भाव के पूर्व लंबे अर्से से धर्म का लोप होते आया था। देशभर में अंधाधूंध, अराजकता, डकैती, लूटमार, खून-खराबा आदि होते थे। तामस यज्ञों का आयोजन किया जाता था। कुंडापंथ, कौल, शाक्त, वाममार्ग, शुष्कवेदांत प्रचलित थे। आसुरी संपत्ति को पोषण मिले ऐसा आचरण चारों तरफ दृष्टिगोचर होता था। वैष्णव संप्रदाय कुछ अंश तक शिथिलता ग्रस्त था।

एसे विषमकाल में संवत 1837 के चैत माह की शुकल पक्ष की नवमी, ता. 2-4-1781 के दिन भगवान श्री स्वामिनारायण ने अयोध्या के समीप आए ग्राम छपैयापुर में श्री धर्मदेव तथा भक्तिमाता के यहाँ अवतार धारण किया। उनके पिता का मूल नाम तो हरिप्रसाद था, परंतु उनमें धर्म के गुण विशेष होने से वे ‘धर्मदेव’ के नाम से प्रख्यात हुए। उनकी माता का नाम प्रेमवती था। उनमें प्रधानतः भक्ति के गुण होने से सब उन्हें ‘भक्तिमाता’ के नाम से संबोधित करते थे।

श्री स्वामिनारायण के प्राकट्य के पूर्व अनेक मुक्त पुरुष अवतरित हो चूके थे, जिन्होंने बाद में श्री स्वामिनारायण के आश्रित हो, उनके सामाजिक तथा धार्मिक क्रांति के कार्य में बहुत बडा योगदान दिया था। सूर्योदय होते ही जिस प्रकार दिशाएँ प्रकाशित होने लगती हैं, उस प्रकार प्रभु के प्राकट्य से उन सभी में अलौकिक आभा उदित हो गई; किसी को दिव्य स्वरूप के दर्शन होने लगे; कई लोगों की संसार की वासना टूट गई, वैराग्यवृत्ति उत्पन्न हुई; सामान्य जनों में मुमुक्षुता जाग्रत होने लगी। प्रभु के प्रादुर्भाव की ऐसी विलक्षणता प्रतीत होने लगी।

श्री स्वामिनारायण का अवतारी प्राकट्य महान संक्रांति के समय ही हुआ। इसु ख्रिस्त की इस अठारवी सदी में अन्य महान व्यक्ति भी प्रकट हुए। गुजरात, कच्छ तथा काठियावाड में धीरो, भोजो, रणछोड, लालो आदि भक्त इस समय थे। दयाराम कवि तथा राजाराममोहनरोय जैसे कवि तथा समर्थ चिंतक भी इस समय में हुए। यह वही सदी थी जिसमें हिंदभर में बडी से बडी सामाजिक, धार्मिक एवं राजकीय क्रांति के इतिहास का सर्जन हुआ। इस क्रांति के इतिहास सर्जन में श्री स्वामिनारायण का योगदान सब से अधिक था।