१३. वर्णाश्रम की यथार्थ व्याख्या
स्वामिनारायण ने वर्णाश्रम धर्म की आवश्यकता को स्वीकार किया तथा उसकी यथार्थ व्याख्याकर, समाज से तिरस्कारवृत्ति के भावों को दूर किया। उन्होंने की हुई व्याख्या निम्नलिखित है।
(1) वर्णाश्रम धर्म सभी समय एक से नहीं रहते। देशकाल अनुसार बदलते रहते है; परंतु अहिंसा, सत्य, ब्रह्मचर्य, क्षमा, दया आदि धर्म सनातन है।
(2) परमेश्वर के अवतार सिर्फ वर्णाश्रम के धर्मों की स्थापना के लिए नहीं होते, परंतु एकांतिक धर्म की स्थापना के लिए होते हैं।
(3) केवल वर्णाश्रम धर्म का पालन करने से मोक्ष नहीं होता; जो मनुष्य वर्ण तथा आश्रम के गर्व के साथ घूमता है उसमें साधुता आती ही नहीं।
स्वामिनारायण ने समाज में अस्पृश्य माने जानेवाले हरिजनों को सत्संगीओं में समान स्थान दिया। उन्हें अनुयायी बनाया। उनके प्रति स्वामिनारायण का वर्तन, उस समय के महान सुधारकों के वर्तन से कई ज्यादा उदार एवं सहानुभूति पूर्ण था।