२९. स्वामिनारायण में दृष्टिकृत होते परमेश्वर के कल्याणकारी गुण
स्वामिनारायण का भगीरथ अवतारी कार्य उनमें विद्यमान इन गुणों को आभारी है। सभी को अपना जीवन उन्नत बनाने के हेतु उपयोगी हों इस उदेश्य से उन गुणों की यादी यहाँ प्रस्तुत की है।
જज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य, शौच, सत्य बोलना, क्षमा, दया, सरलता, त्याग, संतोष, मनकी निश्चलता, समता, तितिक्षा (सहनशीलता), तप, सौंदर्य, कोमलता, क्रिया निपुणता, करुणा, धैर्य, स्थिरता, गंभीरता, सदाचार, निर्मानीता, मन-कर्म-वचन से अहिंसापालन, अस्तेय, षट् उर्मियों रहितता (भूख, प्यास, शोक, मोह, जरा एवं मृत्यु पर विजय), परोपकारी, अपरिग्रह, रमणीय भोग में अरुचि, कुसंग का परित्याग, साधुता, सेवा आदि गुण स्वामिनारायण में सहज ही दृष्टिगोचर होते थे। उनके अनेक उदाहरण हैं, जिनमें से कुछेक पर दृष्टिपात करें :
(1) ग्राम सारंगपुर में एक समय तीन दिन तक वृष्टि हुई। गाँव में कई घर गिर गए। उनमें से एक ब्राह्मण का घर भी गिरा। उसके दस-बीस पशु दब गए। श्रीहरि ने यह देखा और तत्काल ही स्वयं दौडकर गए तथा छप्पर के आधाररूप बल्ले को उठाकर पकड रखा तथा पशु को बाहर निकाला। तदोपरांत गाँव में अनेक गरीब जनों के घरों के पुनःनिर्माण में सहायता कराई। इस प्रकार श्रीहरि दुःखी एवं दरिद्रों की सेवा के लिए बिना बुलाए ही दौड पडते।
(2) स्वामिनारायण वर्णीवेष में वैंकटाद्रि से जगन्नाथपुरी एवं रामेश्वर की ओर जा रहे थे। राह में ‘सेवकराम’ नामक एक साधु जो अतिसार के दर्द से पीडित था, वह उन्हें मिला। दुर्गंध एवं मल से साधु का शरीर स्पर्श न हो सके ऐसा हो गया था। पीडा के कारण कराह रहा था। स्वामिनारायण ने यह देखा उनसे यह देख, सहा न गया। वे सेवकराम की सेवा करने रुक गए। वे सेवकराम को नहलाते, उसके कपडे साफ करते तथा भोजन पकाकर उसे खिलाते। स्वयं गाँव में जाकर भोजनकर आते। किसी दिन बस्ती में अन्न न मिलने पर उन्हें उपवास करना पडता; यह जानते हुए भी किसी दिन सेवकराम ने उन्हें ऐसा नहीं कहा कि ‘मेरे पास द्रव्य है, सो हम दोनों के लिए भोजन तैयार करें तथा आप भी हमारे साथ भोजन करें;’ स्वामिनारायण ने निःस्वार्थभाव से सेवाचाकरी कर सेवकराम को स्वस्थ किया कैसी निःस्वार्थ सेवावृत्ति।
(3) लोजपुर में महाराज (श्री स्वामिनारायण) सदाव्रत चलाते थे। उस सदाव्रत में जो कोई भिक्षुजन आता उसे भोजन कराने स्वयं लंगोट बाँधकर तथा कंधो पर काँवर उठाकर भिक्षा माँगते जाते; और सुबह शाम रोटी बनाकर, वे सबको भोजन कराते। तत्पश्चात् अपने सभी साधुओं को भोजन कराकर अंत में स्वयं भोजन करते।
(4) सहजानंदस्वामी के गुरु रामानंदस्वामी ने स्वयं की अंतिम बेला में सहजानंदस्वामी को दो वरदान माँगने का आग्रह किया। तब सहजानंदस्वामी ने दो वरदान इस प्रकार माँगे :
1. ‘आपके भक्त का बिच्छु के डंख का दुःख भले ही मुझे रोम-रोम में करोड गुना हो, किंतु उस भक्त को न हो।’
2. ‘आपके भक्त की तकदीर में रामपात्र (भीख माँगना) हो तो वह मुझे मिले, परंतु वह भक्त अन्नवस्त्र से सुखी रहे।’
पहेले वरदान में स्वामिनारायण की भक्तवत्सलता तथा करुणा के दर्शन होते हैं। दूसरे वरदान में तो उन्होंने भक्त का प्रारब्ध स्वयं पर ले लिया है। आज दिन तक किसी अवतार ने भक्त के दुःखों तथा प्रारब्ध का स्वयं भार वहन करेंगे ऐसा नहीं कहा है। आज भी उस वरदान के अनुरूप स्वामिनारायण धर्म के साधु-हरिभक्त प्रभुआज्ञा का पालनकर सुख-शांति से जीवन व्यतीत करते हैं। यह ऐतिहासिक हकीकत जैसी-तैसी नहीं है।
(5) सिद्धपुर के एक ब्राह्मण ने श्रीहरि के पास आकर कहा, ‘हे महाराज! मेरे बेटे को यज्ञोपवित देना है तथा घर में कुछ नहीं है, अतः मुझे कुछ दीजिए।’ श्रीहरि ने घोडे से उतरकर उस ब्राह्मण से कहा कि, ‘तुम इस घोडे को ले जाओ, उसे बेचकर उससे प्राप्त रूपयों से बेटे का यज्ञोपवित करना।’ मेथाण के पूंजाजी ने ब्राह्मण को रूपया देकर घोडा वापस ले लिया। ऐसे दयालू स्वभाव के श्रीहरि ने अनेक दुःखित लोगों को सहायताकर उनके दुःख का निवारण किया है।
(6) एक बार श्रीहरि रात्रि के समय अकेले लींमली गाँव के सघराम वाघरी के झोंपडे में पधारें। सघराम तथा उसकी पत्नी आश्चर्यचकित हो गए कि इस वक्त महाराज यहाँ कैसे! महाराज सघराम की फटी गुदडीवाले खटिये पर सारी रात बैठकर उसके परिवार को बोधकर उसे खुश किया। इस प्रकार पिछडे वर्ग के मनुष्यों के प्रति श्रीहरि में बहुत प्रेम तथा भावना थी।
(7) जेतलपुर में यज्ञ किया उस समय श्रीहरि ने प्रत्येक घर में डेढ मन गेहूँ पीसने के लिये दिये। एक वैश्या ने भी याचना की। महाराज ने कहा : ‘अगर तुम अपने भूतकाल की भूलों का निवारणकर पश्चाताप करने तैयार हो तथा तुम स्वयं गेहूँ पीस लाओगी तो तुम्हारा कल्याण करेंगे।’ उस स्त्री ने श्रीहरि के वचन को शिरोमान्य रखा तथा वह स्वयं गेहूँ पीस लाई। तत्पश्चात अपना धंधा छोड, सन्मार्ग पर चल, भक्त बन गई। श्रीहरि में दूसरों के अपराध क्षमाकर कल्याण करने की अपार उदारता थी।
(8) एक बार सहजानंदस्वामी घूमते-घूमते लांघणज गाँव में आए। इस गाँव में सोनबाई भावसार तथा नागर ब्राह्मण गंगामां नामक दो सत्संगी स्त्रियाँ रहती थी। सोनबाई गरीब थी तथा गंगामां धनसंपत्ति से सुखी थी। गंगामां ने सोनबाई से कहा, ‘तुम साधुओं के लिए भोजन तैयार करना तथा मैं महाराज के लिए ऊँचे से ऊँचा चावल पकाकर भोजन तैयार करुँगी।’ सोनबाई को अपनी गरीबी के कारण सहजानंदजी महाराज को भोजन कराने का अपना भाग्य हाथों से निकल रहा हो ऐसा लगा, परंतु भगवान को गरीब-अमीर का फर्क नहीं होता। सहजानंदजी सीधे उस गरीब स्त्री के घर गए तथा उसने साधु के लिए तैयार किए हुए भोजन से भोजन किया। पश्चात् गंगामां थाल लेकर जब आई तब स्वयं के लिए तैयार भोजन सोनबाई को खिलाने की आज्ञा उन्होंने की।
(9) 1869 में बहुत ही भयंकर ‘अगणोतेरो’ (उन्हत्तरा) अकाल पडा तब स्वामिनारायण ने लोगों को अन्नवस्त्र की सहायता करने अपने त्यागी-गृही शिष्यों को भिन्न-भिन्न दुष्कालग्रस्त ईलाकों में भेजा; तथा उनको आदेश दिया कि भूखों को अन्नदान देने में सत्संगी बिन-सत्संगी का भेद नहीं करना। वे स्वयं भी जगह-जगह गए तथा अनेकों को अपने ऐश्वर्य से सहायता कर उगारा। जीवसेवा तथा मानवसेवा यह प्रभुसेवा का एक प्रकार है, यह स्वयं ने आचरण द्वारा बताया।