२५. श्री स्वामिनारायण की व्यक्तिविशेषता
(1) आज पर्यंत हुए सभी महापुरुषों के जीवन से श्रेष्ठ, गतिशील एवं चरित्रसंपन्न दिव्य जीवन स्वामिनारायण का दृष्टिगोचर होता है। वे एकांतिक धर्म के प्रचारार्थ अविरत पैदल या घोडे पर 28 वर्ष तक भ्रमण करते रहे। इस दरमियान उन्होंने हजारों ग्राम तथा शहरों की मुलाकात ली तथा बडी तादाद में मनुष्यों को सदुपदेश देकर प्रभुपरायण बना दिये।
(2) कोई भी मनुष्य चाहे वो हिंदु, पारसी, मुसलमान, खोजा, अंग्रेज, वेद न माननेवाले, जैन हो या कोई भी धर्म का हो वह श्री स्वामिनारायण की दिव्य प्रभा से प्रभावित हुए बिना नहीं रहा।
(3) अनेक लोगों के कल्याण एवं शिक्षण के हेतु वे स्वयं ही साधक, साधन एवं साध्य बने। उनका समस्त जीवन ही जीता जागता धर्मशास्त्र और अध्यात्मशास्त्र बन चुका था।
(4) गहन से गहन तत्त्वदर्शन को वे लोकभाषा में प्रस्तुत कर सकते थे। सामान्य से सामान्य मनुष्य समझ सके ऐसा विवेचन सहजानंदस्वामी कर सकते थे। सीधी, सरल, मिताक्षरी ग्राम्यभाषा एवं वार्तालाप की प्रवचनशैली उनके वश थी।
(5) जनसमूह की जिन अशुद्धियों को वे निकालना चाहते थे उनमें वे हमेंशा रचनात्मक वर्तन दिखाते।
(6) उनका सिद्धांत था कि बूराई का बदला भलाई से देना। स्वयं का बूरा करनेवाले पर भी दया करने को तत्पर रहते थे। उनके जीवन में कीसी भी व्यक्ति को उन्होंने श्राप दिया हो या किसीका बूरा चाहा हो ऐसा नहीं हुआ। उनके अनुयायीओं से कदाचित कोई अपराध हो जाए, तो स्वयं जाकर उसके लिए क्षमायाचना करते।
(7) बालकों के प्रति उन्हें अपार प्रेम एवं अनुकंपा थी। वे स्वयं के नित्य कार्य से अवश्य ही समय निकालकर बच्चों को बोध देते। बालक का दिल दुभने पर वे स्वयं दुःखी होते। बालक के पास भी बालभाव से माफी माँगने में वे लघुता का अनुभव नहीं करते।
(8) सद. प्रेमानंदस्वामी ने उन्हें ‘करुणालोचन’ कहकर गाया है कि :
‘कोई ने दुःखियो रे, देखी न खमाय,
दया आणी रे, अति आकला थाय।
अन्न, धन वस्त्र रे, आपीने दुःख टाले,
करुणादृष्टि रे, देखी वान ज वाले।’
अर्थ : (किसी का दुःख देख सह नहीं सकते थे। दया के कारण अति व्याकुल हो जाते। अन्न, धन, वस्त्र आदि देकर दुःख का निवारण करते। करुणा दृष्टि से देखकर विशुद्ध करते थे।)
(9) स्वामिनारायण ने एक प्रसंग में स्वयं के प्रकट होने के उदेश्य को प्रदर्शित करते हुए कहा: ‘मैं विसंवाद जगाने नहीं, परंतु संवाद जगाने आया हूँ।’
(10) स्वामिनारायण में स्वयं के प्रभाव द्वारा सामनेवाले को आकर्षित करने की यौगिक शक्ति थी तथा उच्चकोटी के आध्यात्मिक जीवन द्वारा लोगों को हमेंशा प्रेरणाबल देने की अजब शक्ति थी। यही उनका बड्डपन तथा प्रभुता थी।
(11) जिस-जिस ने स्वामिनारायण को देखा उनका एक अनुभव निश्चित था कि :
1. उनकी आँखों में अद्भुत जादू था वैसा ही उनकी वाणी तथा चाल में जादू था।
2. उनके नेत्रों से प्रेम की अमृत धारा बहती हो ऐसा प्रतीत होता था।
3. उनके तेजस्वी स्वरूप से आकर्षित होकर सभी नतमस्तक हो जाते थे। आज भी उनकी काष्ठ-पाषाण की प्रतिमाओं में उनका चित्ताकर्षण झलकता है। उनके वरद् हस्त मुद्रा से अभय प्राप्ति की भावना अनुभूतित होती है।
(12) स्वामिनारायण के दाहिने चरण में नौ तथा वाम चरण में सात ऐसे कुल सोलह विलक्षण चिन्ह थे।