३३. भगवान श्री स्वामिनारायण ने दिये हुए दो अभयवचन

1. ‘जो जीव हमारे आश्रय में आएगा तथा धर्मनियम में रहेगा उसे हम अंतःकाल में दर्शन देकर भगवान के अक्षरधाम की प्राप्ति करायेंगे।’

इस वचन के अनुसार आज भी श्री स्वामिनारायण महाप्रभु अंतः समय में स्वयं के आश्रितों को दर्शन देकर स्वयं के दिव्य धाम की प्राप्ति कराते हैं। इस प्रकार स्वामिनारायण ने स्वयं के वास्तविक आश्रितों को मृत्यु के भय से मुक्त किया है।

2. मंदिरों में भगवान की मूर्ति को प्रस्थापित कर उसमें स्वयं के सत्यसंकल्पत्व का सिंचन किया, प्राणप्रतिष्ठा की। तत्पश्चात् प्रभु बोले : ‘यह मूर्ति में मैं सदा प्रत्यक्ष रहूँगा। आपलोगों की सच्ची भक्ति से की हूई पूजा ग्रहण करुँगा तथा आपलोगों के शुभ संकल्प सत्य करूँगा।’ पुनः आगे कहा : ‘हमारी इस दिव्य मूर्ति में तथा प्रतिमाओं में काष्ठ, पाषाण या कागज का भाव प्रतिपादित न करें।’

आज दिन तक भगवान के किसी अवतार ने ऐसी वाणी का उच्चारण किया हो एसा नहीं जान पडता। सर्वोपरी प्रकट प्रभु के सिवा ऐसा वचन देने का सामर्थ्य किसमें हो सकता है?